काव्य श्रृंखला – 63

खुशियों की राखी बातों नातों में सरस मधुमयखटके क्यों युति उसकी चपलाएक नार सृजित सर्जित सकलाकर्तव्य सृजन फिर क्यों अबला पय सुधा पिला बनी मातृ मधुरसमरस समोदर भगिनी सबलाजब धार…

काव्य श्रृंखला – 62

मानव बनाम चप्पल टूटी चप्पल, हुई विचलित नारचुपचाप खड़ी मोची के द्वारपतले प्लास्टिक में बंधी चप्पलना थी खुलने की जिद पर यार निष्ठुर मोची था धुन में मगनललना को नजर…