काव्य श्रृंखला – 64

इंसान बनाम कुत्ता तब इंसान पालता था कुत्ताअब इंसान पालता है, कुत्ताबाइक सवार देखा एक दिनपट्टा था एक व सवारी तीनथा मजेदार कुछ अलबत्ताविस्मित अर्पण हक्का बक्कादोनों के गले एक…

काव्य श्रृंखला – 62

मानव बनाम चप्पल टूटी चप्पल, हुई विचलित नारचुपचाप खड़ी मोची के द्वारपतले प्लास्टिक में बंधी चप्पलना थी खुलने की जिद पर यार निष्ठुर मोची था धुन में मगनललना को नजर…