काव्य श्रृंखला – 42

कैसे मनाए श्रम दिवस चुपचाप बैठा धाम मेंआंसू भरी आंखें लिएचिंता सताए शाम कीरोटी मिले या ना मिले बच्चों का क्रंदन असह्य हैभार्या का सूना भाल हैजीवन की प्रत्याशा घटीसुरसा…