काव्य श्रृंखला – 59

बेखुद ख्वाहिशें मैं शराबी नहीं हूं मगर, हमकदमएक ख्वाहिश है नजरों से पीता चलूं बेखुदी में भी ठिठकें न बढ़ते कदमलड़खड़ाऊं मगर उठकर जीता चलूं नासमझ हूं सुरों और सरगम…