काव्य श्रृंखला – 59

बेखुद ख्वाहिशें मैं शराबी नहीं हूं मगर, हमकदमएक ख्वाहिश है नजरों से पीता चलूं बेखुदी में भी ठिठकें न बढ़ते कदमलड़खड़ाऊं मगर उठकर जीता चलूं नासमझ हूं सुरों और सरगम…

काव्य श्रृंखला – 45

क्या हुआ अगर चले थे ढूंढने इंसानियत गुमनाम राहों मेंदिशाएं स्याह, काले मन, बड़ी संगीन दुनिया थीभले मानुष दिखे अब रेड डाटा बुक के पन्नों परसड़ी बुद्धि, भ्रमित जनता, बड़ी…