काव्य श्रृंखला – 62

मानव बनाम चप्पल टूटी चप्पल, हुई विचलित नारचुपचाप खड़ी मोची के द्वारपतले प्लास्टिक में बंधी चप्पलना थी खुलने की जिद पर यार निष्ठुर मोची था धुन में मगनललना को नजर…

काव्य श्रृंखला – 60

प्रेम ही तो लिखता हूं स्पर्श मधुरनख शिख वर्णनप्रिय काम कला नहीं लिखता हूं सुंदर गातेंकटि, अधर, वलयबस युवा प्रणय नहीं लिखता हूं जीवन रसदिल की बातेंजो लखता हूं, वही…

काव्य श्रृंखला – 59

बेखुद ख्वाहिशें मैं शराबी नहीं हूं मगर, हमकदमएक ख्वाहिश है नजरों से पीता चलूं बेखुदी में भी ठिठकें न बढ़ते कदमलड़खड़ाऊं मगर उठकर जीता चलूं नासमझ हूं सुरों और सरगम…