गीता माणिक्य – 11


अध्याय – 1 / श्लोक – 39 से 43

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोSभिभवत्युत।।39।।

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वाष्णेय जायते वर्णसंकरः।।40।।

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।।41।।

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्‍यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।।42।।

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम।।43।।
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अनुवाद –

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा – हे कृष्णǃ कुल का विनाश होने पर सनातन धर्म से वर्णित कुल परंपरा भी नष्ट हो जाती है तथा कुल परंपरा के नष्ट होने पर शेष कुल भी अधर्म में प्रवृत्त हो जाता है। जब कुल में अधर्म की प्रमुखता हो जाती है तो यह सबसे पहले कुल की स्त्रियों को दूषित करता है। हे वृष्णिवंशी कृष्णǃ इस प्रकार अधर्म से पतित स्त्रियों की संतानें वर्णसंकर उत्पन्न होती हैं। परिवार का नाश हाेने और कुल परंपरा की क्षति से उत्पन्न ऐसे वर्णसंकर परिवार में नरक जैसा माहौल उत्पन्न करते हैं। ऐसे पतित कुलों के पुरखे भी जल और पिण्डदान की परंपराओं के समाप्त होने के कारण पतित हो जाते हैं। कुल परंपरा का नाश करने वाले ऐसे लोग जो वर्णसंकरों को जन्म देते हैं उनके दुष्कर्मों से समस्त प्रकार की सामाजिक परंपराएं और पारिवारिक धार्मिक कार्य विनष्ट हो जाते हैं। हे प्रजापालक कृष्णǃ मैंने गुरुओं के सानिध्य में रहकर जाना है कि कुलधर्म का विनाश करने वाले ऐसे जोग सदा नरकगामी ही होते हैं।

सनातन धर्म परंपरा में जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार तय किए गए हैं और जीवन में आने वाले हर परिवर्तन के साथ – साथ परिवार के दिवंगत सदस्यों से जुड़ाव कायम रखने तक के लिए एक संस्कार नियत किए गए हैं। ऐसी शाश्वत परंपरा वाले सनातन धर्म में ये सारे संस्कार परिवार के वयोवृद्ध सदस्यों द्वारा अथवा उनके मार्गदर्शन में ही संपन्न किए जाते है। परिवार के बुजुर्ग सदस्य एक वटवृक्ष की छाया के समान होते हैं जो समस्त परिवार को एक साथ रखने के साथ – साथ उनके समुचित विकास में भी अग्रणी भूमिका निभाते हैं। बुजुर्गों से हीन परिवारों के युवा आम तौर पर व्यसनों के शिकार हो जाते हैं और कुल की परंपराओं को अतार्किक या अनावश्यक मानने लगते हैं। प्राचीन परंपरा कि अनुसार संतान की प्रवृत्ति और प्रकृति सामान्य तौर पर उसे जन्म देने वाली स्त्री के सतीत्व और निष्ठा पर निर्भर करती है। परिवार के अनियंत्रित होने का दुष्प्रभाव परिवार की स्त्रियों पर भी पड़ता है और इसका दुष्परिणाम परिवार में अवांछ्ति संतानों की उत्पत्ति के रुप में सामने आता है। ऐसी संतानें कुल की परंपरा और धर्माचरण से विमुख होती हैं और कुल के नाश का कारण बनती हैं। अतः अर्जुन के मतानुसार किसी भी स्थिति में परिवार के बड़े बुजुर्गों का वध उचित नहीं है।

आधुनिक सत्य के विपरीत इस संदर्भ में चाणक्य का कहना है कि स्त्रियां सामान्यतया बुद्धिमान न होने के कारण विश्वसनीय नहीं होतीं तथापि उनका यह भी मानना है कि परिवार में वर्णाश्रम व्यवस्था के समुचित पालन और योग्य संतति की उत्पत्ति हेतु परिवार की स्त्रियों का विविध कुल एवं धार्मिक परंपराओं में व्यस्त रहना आवश्यक है जिससे उनका सतीत्व और अनुरक्ति विवादरहित बना रहे।

सकाम कर्म पद्धति के अनुसार कुल के पितरों को समय–समय पर जल एवं पिण्डदान किया जाना चाहिए। कभी–कभी पितरों में भी कुछ लोग पापों से ग्रस्त होते हैं और कुछ को विभिन्न कारणों से स्थूल शरीर की प्राप्ति नहीं हो पाती जिसके कारण वे लोग प्रेत योनि में ही सूक्ष्‍म शरीर धारण करने हेतु विवश हो जाते हैं। जल एवं पिण्डदान के फलस्वरुप ऐसे पितरों को पापों तथा प्रेतयोनि से मुक्त होने में सहायता मिलती है और यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष में प्रत्येक सनातन धर्मानुयायी परिवार अपने पितरों के लिए ऐसे अनुष्ठान अवश्य करता है। श्रीमदभागवत महापुराण में कहा गया है–

देवर्षि भूताप्तनृणां पितृणां न किंकरो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्।। 

सनातन धर्म परंपरा में चारों वर्णों के लिए सामजिक योजनाएं एवं पारिवारिक कल्याण कार्य मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति हेतु नियोजित हैं। इन परंपराओं के विखण्डन से सामाजिक अव्यवस्था को जन्म मिलता है और ऐसे लोग जीवन के मूल उद्देश्य से विमुख हो जाते हैं। अर्जुन अपने विचारों की सिद्धि हेतु गुरुजनों द्वारा प्राप्त ज्ञान का उदाहरण देता है। वर्णाश्रम की एक पद्धति के अनुसार मृत्यु से पूर्व मनुष्य को पापकर्मों के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा किए बिना शरीर त्याग करने वाली पापात्माएं निश्चित तौर पर नरकगामी होती हैं जहां उन्हें अपने पापों के लिए घोर यातनाओं एवं कष्टों को सहना पड़ता है।

चर्चा जारी रहेगी
तब तक के लिए
जय श्रीकृष्ण

– Arun अर्पण

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काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

आप इस श्रृंखला की पिछले भागों को नीचे दिए गए लिंक द्वारा भी पढ़ सकते हैं–

गीता माणिक्य *** गीता माणिक्य – 1 *** गीता माणिक्य – 2 *** गीता माणिक्य – 3 *** गीता माणिक्य – 4 *** गीता माणिक्य – 5 *** गीता माणिक्य – 6 *** गीता माणिक्य – 7 *** गीता माणिक्य – 8 *** गीता माणिक्य – 9 *** गीता माणिक्य – 10

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Albela Darpan

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