गीता माणिक्य – 10


अध्याय – 1 / श्लोक – 31 से 38

न च श्रेयोSनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।
न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।।31।।

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।
येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।।32।।

त इमेSवस्थिता युद्धे प्राणंस्त्यक्त्वा धनानि च
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।।33।।

मातुलाः श्वसुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोSपि मधुसूदन।।34।।

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेताः किं नु महीकृते।
निहत्य धर्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।।35।।

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव।।36।।

यद्‍यप्येते न पश्यन्ति लाभेपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।37।।

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन।।38।।
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अनुवाद –

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा – हे कृष्णǃ इस युद्ध में स्वजनों का वध करने में मुझे न तो काेई अच्छाई दिखती है और न ही इसके परिणामस्वरुप मिलने वाले विजय, राज्य अथवा सुख की कामना करता हूं। हे गाविन्दǃ हमें इस राज्य, सुख अथवा जीवन से क्या लाभǃ जिन लोगों के लिए हम इस समस्त सुखों की इच्छा रखते है वे सभी लोग तो आज यहां युद्धभूमि में खड़े हैं। हे मधुसूदनǃ जब गुरु, मामा, पितृगण, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले और अन्य सभी सगे संबंधी यहां युद्ध में अपना तन और धन त्यागने हेतु तत्पर हैं तो इन लोगाें को मारकर मुझे क्या मिलेगा, इससे तो बेहतर है कि यही लोग मुझे मार दें। हे जीवों के पालकǃ भले ही मुझे पृथ्वी तो क्या तीनों लोकों का राज्य ही क्यों न मिल जाए फिर भी मैं इन सभी लोगों से लड़ने हेतु तैयार नहीं हूं। आखिर धृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मारकर हमें कौन सी खुशी मिल जाएगी? यदि हम ऐसे आततायियों का संहार करते हैं तो हम पर ही पाप चढ़ेगा। अतः हे लक्ष्‍मीपति ǃ अपने ही कुटुंबियों को मारकर हमें क्या लाभ प्राप्त होगा और ऐसा करके हम किस प्रकार सुखी रह सकते हैं? हे जनार्दनǃ लोभ से वशीभूत ये लोग स्वजनों को मारने और मित्रद्रोह में भले ही पाप न देखते हों किंतु अपने ही परिवार के विनाश के अपराध को देखने के बावजूद हम इस पाप में कैसे भागीदार बन सकते हैं?

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जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।
कुछ ऐसी ही स्थिति महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष की थी। अर्जुन एक क्षत्रिय एवं वीर योद्धा होने के साथ – साथ एक भक्त और लोककल्याणकारी व्यक्ति थे। एक तरफ जहां क्षत्रिय धर्म युद्ध में शत्रु पक्ष के समूल नाश की प्रेरणा देता था तो वहीं दूसरी तरफ शत्रु के स्थान पर अपने सगे संबंधियों एवं मित्रजनों को देखकर अर्जुन को वह युद्ध अप्रासंगिक लगने लगा था। यह स्थिति एक तरफ कौरव पक्ष के लिए तो अत्यंत प्रसन्नता का विषय थी तो वहीं दूसरी तरफ एक धर्मयुद्ध में धर्म की रक्षा हेतु खड़े योद्धा की धर्म के प्रति विमुखता। सगे संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन पूरी तरह से किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुके थे और सभी धर्मों और आदर्शों पर स्वजनों के प्रति मोह अचानक ही हावी हो गया था। भौतिक जीवन का यह सामान्य आदर्श है कि हम समस्त भौतिक सुख सुविधाएं स्वजनों के लिए ही जुटाते हैं अन्यथा अर्जुन जैसे संत योद्धा के लिए तो एकाकी जीवननिर्वाह के लिए वन में एक कुटिया भी पर्याप्त थी। हालांकि आध्यात्मिक जीवन का लेखा जोखा भौतिकता से कभी प्रभावित नहीं होता और वह हमेशा ईश्वर की प्रेरणा से ही कार्यरत होता है। अर्जुन स्वयं उन संबंधियों का वध नहीं करना चाहते थे और यदि उनका वध निश्चित ही था तो वह यह कार्य कृष्ण के हाथों कराने के इच्छुक थे। वह यह भांपने में विफल रहे कि कृष्ण के लिए तो वे सभी लोग पहले ही मारे जा चुके थे और युद्धक्षेत्र में तो अर्जुन को इस कार्य में निमित्त मात्र ही बनना था।

वैदिक आदेशों के अनुसार आततायी 6 प्रकार के होते हैं–
1. विष देने वाला
2. घर में अग्नि लगाने वाला
3. घातक हथियार से आक्रमण करने वाला
4. धन लूटने वाला
5. दूसरे की भूमि हड़पने वाला
6. पराई स्त्री का अपहरण करने वाला

ऐसे आततायियों के वध को प्राचीन नीतियों के अनुसार पाप की श्रेणी से बाहर रखा गया था। एक योद्धा संत तो हो सकता है किंतु उसे कायर होने का कोई अधिकार नहीं है। भगवान राम भी एक संत राजा थे और उनके रामराज्य की चर्चा आज भी बड़े सम्मान के साथ की जाती है किंतु रावण ने जब सीता माता का अपहरण करके आततायी की भूमिका निभाई तो राम ने भी उसका संहार करने में कोई शिथिलता नहीं दिखाया। हालांकि अर्जुन के समक्ष आततायियों की भूमिका में उसके सगे संबंधी ही थे तथापि उसे कोई शास्त्रसम्मत अधिकार नहीं था कि वह उनके संहार से विमुख हो जाए। वह एक तरफ तो युद्धक्षेत्र में आकर खड़ा हो गया था जहां से पीछे हटना कायरता और राजद्रोह मानी जाती वहीं दूसरी तरफ वह यह भी नहीं चाहता था कि उसके हाथों किसी सगे संबंधी का वध हो। अतः वह इसी प्रयत्न में जुटा हुआ था कि किसी भी तरह से कृष्ण उसे युद्धार्थ प्रेरित न करें और वह एक संभावित अनिष्ट का भागीदार बनने से बच जाए। सभी पक्षों पर विचार करने के पश्चात तत्कालीन परिस्थिति में अर्जुन को युद्ध न करना ही ज्यादा श्रेयस्कर लग रहा था।

चर्चा जारी रहेगी
तब तक के लिए
जय श्रीकृष्ण

– Arun अर्पण

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यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत I
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम II

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम I
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वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः:I
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: II

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

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आप इस श्रृंखला की पिछले भागों को नीचे दिए गए लिंक द्वारा भी पढ़ सकते हैं–

गीता माणिक्य
गीता माणिक्य – 1
गीता माणिक्य – 2
गीता माणिक्य – 3
गीता माणिक्य – 4
गीता माणिक्य – 5
गीता माणिक्य – 6
गीता माणिक्य – 7
गीता माणिक्य – 8
गीता माणिक्य – 9

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