गीता माणिक्य – 8


अध्याय – 1 / श्लोक – 24 से 26

संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुर्भयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।24।।

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां  च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्येतान्सम्वेतान्कुरुनिति।।25।।

तत्रापश्यत्स्थिान्नपार्थः पितृनथ पितामहान्
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्सखींस्तथा।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।।26।।

अनुवाद –

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा – हे भरतवंशी महाराजǃ अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उसके उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया। भीष्म, द्रोण तथा विश्व भर से युद्धार्थ एकत्रित समस्त राजाओं समक्ष भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा – हे पार्थǃ यहां एकत्रित सम्पूर्ण कौरव सेना को देखो। अर्जुन ने वहां पर दोनों सेनाओं में सम्मिलित अपने चाचा–ताउ, पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, ससुर एवं शुभचिंतक वृंद को भी देखा।

उपराेक्त श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण को गुडाकेश कहा गया है। गुडाका का अर्थ अज्ञान और नींद दोनों होता है तथा गुडाकेश का अर्थ नींद या अज्ञान को जीतने वाला होता है। इस प्रकार जो कृष्ण भक्ति में लीन अर्जुन जैसे परम भक्त कृष्णमय होकर स्वयं भी अज्ञान व नींद पर विजय प्राप्त कर लेते हैं और ऐसी स्थिति को ही कृष्णभावनामृत अथवा समाधि कहा जाता है। भगवान और भक्त के बीच कुछ भी छ्पिा नहीं रहता और भक्त की समस्त शंकाओं से भगवान भली भांति परिचित होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी अर्जुन के दोनों सेनाओं के बीच रथ ले जाने के आदेश के पीछे छ्पिे मनोभावों से अपरिचित नहीं थे और वह समझ चुके थे कि अर्जुन के मन का संशय दूर करना परम आवश्यक है। इसीलिए वे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले गए। भगवान श्रीकृष्ण को हृषीकेश भी कहा गया है जिसका अर्थ होता है प्रत्येक जीव की इंद्रियों और मन को निर्देशित करने वाला। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की बुआ पृथा (वासुदेव की बहन तथा कुंती के नाम से प्रसिद्ध) के पुत्र थे और इसीलिए उन्हें पार्थ भी कहा जाता था। पितृसत्ता एवं मातृसत्त के मध्य अंतर न करने वाली प्राचीन भारतीय परंपरा का इसे सुंदर उदाहरण और कहां मिल सकता है। उनसे अर्जुन के मन में सगे संबंधियों से युद्ध करने की दुविधा भी उनसे छ्पिी नहीं थी फिर भी भगवान अगर भक्त को अपने मन की बात कहने का अवसर न दे तो भक्त की दुविधा का समुचित समाधान कैसे हो सकता है। अतः भगवान श्रीकृष्ण ने सब कुछ जानते हुए भी एक सारथि के कर्तव्य का पालन करते हुए अर्जुन का रथ दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कर दिया और अर्जुन से वहां उपस्थित समस्त कुरुवंश की सेना को देखने को कहा।

चर्चा जारी रहेगी
तब तक के लिए
जय श्रीकृष्ण

– Arun अर्पण

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत I
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम II

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम I
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे II

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:I
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन II

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः:I
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: II

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

आप इस श्रृंखला की पिछले भागों को नीचे दिए गए लिंक द्वारा भी पढ़ सकते हैं–

गीता माणिक्य
गीता माणिक्य – 1
गीता माणिक्य – 2
गीता माणिक्य – 3
गीता माणिक्य – 4
गीता माणिक्य – 5
गीता माणिक्य – 6
गीता माणिक्य – 7

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Albela Darpan

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