गीता माणिक्य – 7


अध्याय – 1 / श्लोक – 20 से 23

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।।20।।

अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेSच्युत।।21।।

यावदेतान्निरीक्षेSहं योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह याेद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे।।22।।

योत्स्यमानानवेक्षेSहं य एतेSत्र समागताः
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीषवः।।23।।

अनुवाद –

संजय महाराज धृतराष्ट्र को आगे का हाल बताते हुए कहते हैं– हे राजनǃ शंखध्वनि के पश्चात हनुमानयुक्त ध्वज लगे हुए रथ पर सवार अर्जुन अपना धनुष उठाकर तीर चलाने के लिए उद्‍यत हुआ। आपके पुत्रों अथवा कौरण सेना को व्यूहबद्ध ढंग से खड़े देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा– हे अच्युतǃ कृपा करके मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले चलें जहां से मैं युद्ध की कामना से एकत्र उन सभी लोगों को देख सकूं जिनसे शास्त्रों की परीक्षा की घड़ी में मुझे संघर्ष करना है। मुझे उन लोगों को भी देखने दीजिए जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन को प्रसन्न करने की इच्छा से यहां युद्ध हेतु एकत्र हुए हैं।

ऐसा नहीं था कि युद्ध के मुहाने पर खड़ा होकर सिर्फ दुर्योधन ही व्याकुल था, पाण्डव पक्ष में भी अर्जुन एक अलग ही असमंजस का शिकार था क्योंकि जिन लोगों से उसे युद्ध करना था वो सभी उसके सगे संबंधी ही तो थे। इस युद्ध में विजय के सभी लक्षण पाण्डव पक्ष में ही दिख रहे थे। जिसकी पताका पर स्वयं हनुमान जी विद्‍यमान हों उसकी पताका को हिलाने का भी बल किसके अंदर हो सकता है तथा जिस रथ के सारथि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हों उस रथ के प्रताप के सामने संसार की कौन सी शक्ति अपनी जीत का दावा कर सकती है। अर्थात अर्जुन इस युद्ध के प्रारंभ से ही अजेय बन चुके थे। यहां भगवान ने भक्त का सारथी बनना स्वीकार किया था। इसका स्पष्ट अर्थ कि उनके हाथों में सिर्फ घोड़ों की लगाम ही नहीं बल्कि अर्जुन के जीवन की बागडोर भी प्रत्यक्ष रुप से थी। एक सारथी के रुप में अर्जुन की आज्ञा का पालन करना उनका कर्तव्य था किंतु इससे उनका स्थान तो नहीं बदल गया था। उसी प्रकार एक रथी के तौर पर अर्जुन श्रीकृष्ण को आदेश देने के लिए विवश थे किंतु उन्हें अपने आराध्य की मर्यादा का पूरा ध्यान था और इसी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए अर्जुन ने श्रीकृष्ण को अच्युत कहकर संबोधित किया। सेनाओं के मध्य जाकर देखने का अर्जुन का निर्णय अत्यंत साहसिक एवं विवेकपूर्ण था जिससे उन्हें यह अंदाजा लग सके कि उन्हें दुर्योधन के पक्ष में युद्ध हेतु आए किन योद्धाओं से संघर्ष करना है। युद्ध कभी भी एकदिश होकर नहीं लड़े जा सकते। युद्ध में यह भी ध्यान रखना होता है कि किस प्रकार अपने पक्ष की न्यूनतम हानि के साथ विजय प्राप्त की जा सकती है और प्रत्येक योद्धा या समूह के लिए एक अलग रणनीति की भी आवश्यकता होती है। चूंकि प्राचीन युद्धों के नियम के अनुसार एक दूसरे पर तभी वार किया जा सकता था जब युद्ध की आधिकारिक दुंदुभी बज चुकी हो और सूर्यास्त नहीं हुआ हो। इसीलिए तत्कालीन युद्धों को धर्मयुद्ध भी कहा जाता था जो सामान्य तौर पर धर्म और न्याय की रक्षा हेतु नियमपूर्ण तरीके से ही लड़े जा सकते थे। महाभारत का युद्ध भी एक ऐसा ही धर्मयुद्ध था जहां एक तरफ न्याय और सम्मान की लड़ाई थी तो दूसरी तरफ अन्याय और अधर्म के पहरुओं के अनुयायी। जहां एक तरफ स्वयं श्रीकृष्ण विद्‍यमान थे तो दूसरी तरफ दुर्बुद्धि दुर्योधन और उसकी मंडली जिसमें कुछ महान धार्मिक विभूतियां भी शामिल थीं किंतु युद्ध में अपने विनाश निश्चित जानकर भी वे अपने वचनों से आबद्ध होने के कारण अधर्म का साथ देने को विवश थे। यद्‍यपि युद्ध टालने के सारे प्रयास विफल हो चुके थे और इस स्तर पर आकर कौरव पक्ष में युद्ध न होने देने की इच्छा भी नहीं दिख रही थी इसलिए अर्जुन यह जानना चाहते थे कि ऐसे कौन से योद्धा हैं जो सब कुछ जानकर भी कौरवों का साथ देने के लिए ससैन्य पधारे हैं।

चर्चा जारी रहेगी
तब तक के लिए
जय श्रीकृष्ण

– Arun अर्पण

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत I
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम II

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम I
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे II

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:I
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन II

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः:I
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: II

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

आप इस श्रृंखला की पिछले भागों को नीचे दिए गए लिंक द्वारा भी पढ़ सकते हैं–

गीता माणिक्य
गीता माणिक्य – 1
गीता माणिक्य – 2
गीता माणिक्य – 3
गीता माणिक्य – 4
गीता माणिक्य – 5
गीता माणिक्य – 6

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Albela Darpan

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