गीता माणिक्य – 1


अध्याय–1/श्लोक–1

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किंकुर्वत संजय।।

अनुवाद–

धृतराष्ट्र ने कहा– हे संजय! धर्म के क्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए पाण्डु के पुत्रों तथा मेरे पुत्रों ने क्या किया?

सुलह के समस्त प्रयत्नों के विफल रहने के बाद जब युद्ध एकमात्र उपाय शेष रह गया तो दुर्योधन एवं युद्धिष्ठिर दोनों द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण के पास सहायता मांगने पहुंच गए। जिस समय दोनों वहां पहुंचे तो भगवान श्रीकृष्ण तत्क्षण विश्राम कर रहे थे। उन्हें सोता देखकर दुर्योधन दंभवश उनके सिरहाने जाकर बैठ गया जबकि युद्धिष्ठिर ने उनके पैरों की तरफ आसन ग्रहण किया। निद्रा भंग होने पर भगवान की प्रथम दृष्टि युद्धिष्ठिर पर पड़ी और उन्होंने बड़े ही हर्ष के साथ उनका स्वागत किया। दुर्योधन को इस बात से स्वयं का अपमान महसूस हुआ और वह मन ही मन डरने लगा कि जिस सहायता की कामना से वह द्वारका आया है कहीं वही सहायता युद्धिष्ठिर भी न मांग ले। अतः उसने तुरंत केशव का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हुए अपनी मांग सामने रख दी। दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की अक्षौहिणी सेना मांग ली जबकि युद्धिष्ठिर ने स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को ही अपने पक्ष में मांग लिया। दुर्योधन उस समय अत्यधिक प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का वचन पहले ही प्राप्त हो चुका था कि युद्ध में श्रीकृष्ण और बलराम किसी भी पक्ष की तरफ से शस्त्र नहीं उठाएंगे। युद्धिष्ठिर का अपने पक्ष में श्रीकृष्ण को मांगना उसे हास्यास्पद लगा और वह श्रीकृष्ण की विशाल सेना के साथ अपनी विजय सुनिश्चित मानकर हस्तिनापुर लौट आया। उधर पुत्रमोह में पूरी तरह अंधे हो चुके नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र के मन में प्रबल उत्कंठा का वातावरण था और वह शीघ्रातिशीघ्र युद्ध में अपने पुत्रों को विजयी देखने हेतु लालायित था किंतु नेत्रहीनता के कारण वह न तो युद्ध में प्रत्यक्ष रुप से भाग ले सकता था और न ही युद्ध के घटनाक्रम को देख सकने में सक्षम था। उसने अपनी इस इच्छा को महर्षि वेदव्यास के सम्मुख प्रकट किया और उनसे युद्ध का आंखों देखा हाल जानने की इच्छा व्यक्त किया। दयालु और दिव्यदृष्टा ऋषि को युद्ध के परिणाम की भयावहता का पूरा ज्ञान था अतः उन्होंने धृतराष्ट्र के योग्य मंत्री संजय को युद्धकाल हेतु दिव्यदृष्टि प्रदान किया जिसकी सहायता से संजय ने महाभारत के युद्ध का सजीव वर्णन धृतराष्ट्र के सम्मुख प्रस्तुत किया।

उपरोक्त श्लोक में धृतराष्ट्र संजय से यही जानने की चेष्टा करते हैं कि युद्ध के मैदान में एक–दूसरे के सम्मुख उपस्थित पाण्डुपुत्रों और उसके पुत्रों के बीच युद्ध की क्या स्थिति है।

अब प्रश्न उठता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान को आखिर धर्मक्षेत्र क्यों कहा गया?

वास्तविक अर्थों में महाभारत का युद्ध राज्य और संपत्ति की लड़ाई से अधिक एक धर्मयुद्ध ही तो था। परिवार का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते वंश परंपरा के अनुसार राज्य के प्रथम उत्तराधिकारी युद्धिष्ठिर थे किंतु कौरवों विशेष रुप से दुर्योधन द्वारा हर संभव प्रयत्न किया गया कि पाण्डुपुत्रों को राज्य में कोई भी भाग न मिलने पाए। पाण्डवों को वनवास, लाक्षागृह दहन द्वारा मारने का प्रयत्न, भरी सभा में द्रौपदी का अपमान एवं श्रीकृष्ण द्वारा सुलह की कोशिश को दरकिनार करते हुए अपमानित करने की कोशिश के पश्चात अब युद्ध ही एकमात्र विकल्प शेष रह गया था। इसके साथ ही राजवंशों के सहयोग, कर्ण, भीष्मादि सेनापतियों की अपने पक्ष में युद्ध की घोषणा एवं बलराम द्वारा मिले वचन के पश्चात दुर्योधन को अपनी जीत सुनिश्चित दिखने लगी थी और इसके कारण उसका मनोबल सातवें आसमान पर था। उधर पाण्डवों के पास अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए अपना पुरुषार्थ, गिनती के राजवंशों का साथ और श्रीकृष्ण के सहयोग का ही सहारा था। कहा जाता है कि अगर अपना बल अधिक दिखता हो तो लड़ने की व्याग्रता भी अधिक होती है और यही वह मौका होता है तब गलती की संभावना सर्वाधिक होती है। धृतराष्ट्र समेत समूचे कुरुवंश को अपने बल के दंभ में निश्चित विनाश की आहट सुनाई नहीं पड़ी और एक – एक करके समूचे कुरुवंश का सर्वनाश हो गया। इस युद्ध में एक तरफ धर्म और अधिकारों की लड़ाई थी तो दूसरी तरफ धर्म के राज्य के बलपूर्वक हनन एवं अनैतिकता का ताण्डव। युद्ध का परिणाम तो मनीषियों को पहले से ही पता था किंतु जनकल्याण हेतु आततायियों का वध भी तो आवश्यक था।

चर्चा जारी रहेगी
तब तक के लिए
जय श्रीकृष्ण

– Arun अर्पण

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत I
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम II

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम I
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे II

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:I
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन II

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः:I
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: II

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

8 Comments

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.