गीता माणिक्य


ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।

श्री चैतन्यमनोSभीष्टं स्थापितं येन भूतले।
स्वयं रुपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम्।।

वन्देSहं श्रीगुरोः श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांश्च।
श्रीरुपं साग्रजातं सहगणरघुनाथान्वितं तं सजीवम्।।

साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्यदेवं।
श्रीराधाकृष्णपादान् सहगणललिताश्रीविशाखान्वितांश्च।।

हे कृष्ण करुणासिन्धो दीनबन्धो जगत्पते।
गोपेश गोपिकाकान्त राधाकान्त नमोSस्तु ते।।

तप्तकांचनगौरांगि राधे वृन्दावनेश्वरि।
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये।।

वांछा कल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः।।

श्रीकृष्ण – चैतन्य प्रभु – नित्यानन्द।
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द।।

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस श्रीकृष्णजन्माष्टमी की पावन बेला में प्रभु के चरणों में बारम्बार प्रणाम।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भौतिक अवतार के दौरान अनेकों ऐसे उदाहरण स्थापित किए जो आज भी अनुकरणीय हैं। ऐसा ही एक कार्य उन्होंने महाभारत के रण के आरंभ में कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता ज्ञान के रुप में किया था जिसका एक एक शब्द किसी जीवन दर्शन से कम नहीं है।

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर हमारा यह ब्लॉग आप सभी के लिए सम्पूर्ण गीता ज्ञान की एक श्रृंखला आरंभ करने जा रहा है जिसके अंतर्गत हम क्रमिक रुप से अध्यायवार और श्लोकवार विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे जिसके अंतर्गत श्लोकों के मूल पाठ के साथ – साथ उनके अनुवाद और उनसे संबंधित जीवन दर्शन पर एक सारगर्भित चर्चा प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाएगा। हमें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह प्रयास आपके जीवन के प्रति दृष्टिकोण को सकारात्मक दिशा देने में सफल सिद्ध होगा।

इस श्रृंखला के पहले भाग के अंतर्गत हम कल दिनांक 31 अगस्त 2021 से प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक से प्रारंभ करेंगे और इसी प्रकार यह श्रृंखला अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोक तक जारी रहेगी।

भगवान श्रीकृष्ण के शुभाशीष एवं आप सभी की शुभकामनाओं का आकांक्षी –

– Arun अर्पण

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