विचार श्रृंखला – 40

खाक छानता बचपन

दे दो न दीदी…………….
दे दे न भैया………………
राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 5 से अंदर आते समय सीढियों पर अक्सर ये शब्द सुनाई दे जाते हैं और फिर जो नजर आता है वह किसी सभ्य समाज के लिए निश्चित ही शर्म का विषय है।
जी हाँ, बिल्कुल सही पढा आपने।
मैं देश के दिल दिल्ली की ही बात कर रहा हूँ।
पिछले दिनों एक ऐसी ही घटना से मैं दो – चार हुआ और वो वाकया निश्चित ही सोचने का विषय है।

कनॉट प्लेस से वापस आते समय राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 5 पर पहली झलक मिली एक लडकी की। जो शायद खरीदारी करने आई थी या किसी अन्य कार्य से।
आगे – आगे वो लडकी और पीछे – पीछे गंजी चांद वाला एक छोटा सा बच्चा। लडका बार – बार उस लडकी के पैरों को जकड कर लेट जाता था और वो लडकी बुरी तरह डरकर चिल्ला रही थी।
आजकल भीड केवल तभी सक्रिय दिखती है जब या तो किसी पर हाथ साफ करना हो या फिर सिर्फ भीड दिखना हो। इसके अलावा सामने कुछ भी हो जाए, लोग या तो मूकदर्शक बने रहते हैं या फिर नई परंपरा के अनुसार वीडियो बनाते रहते हैं।
इस मामले में वो लडकी भाग्यवान रही कि उसे उसके डर से निजात दिलाने के लिए एक सज्जन ने उस बच्चे को डांटकर भगाया और वो लडकी भी भागती हुई दूसरी तरफ चली गई।

अभी सीढियों से नीचे उतर ही रहा था कि ऐसा ही एक और वाकया आंखों के सामने था।
एक दूसरी बच्ची एक लडकी के पैरों में लिपटी हुई थी और उसके दोस्त की हर कोशिश के बाद भी छोडने के लिए तैयार नहीं थी।
शायद वह भी जानती थी कि गर्लफ्रेंड के सामने दयालुता का लाभ उठाने का उससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था।
पास पहुंचकर जब मैंने उसे जोर से डांटा तो उस बच्ची ने लडकी को तो आजाद कर दिया लेकिन उसके बाद जो प्रत्यय और उपसर्ग उसने मेरे लिए निकाले कि सुनकर कान के पर्दे फट जाएं।
ऐसी भयंकर गालियां एक छोटी सी बच्ची के मुंह से सुनकर मैं दंग रह गया।

वहीं इस घटना से ठीक पहले एक और दृश्य देखने को मिला था।
अगर आप कनॉट प्लेस जा रहे हों तो आपको एक चौक पर कबूतरों की एक पूरी जमात दाना चुगते हुए मिल जाएगी।
उन्हीं कबूतरों के बीच एक मानव बच्चा भी दिखा जो शायद कचरा चुनते चुनते थक गया था या भूख से व्याकुल उन्हीं कबूतरों के बीच एक निवाले की तलाश में था।

जो बच्चे भीख मांग रहे थे, वो वस्तुतः या तो परिस्थिति के मारे थे या फिर उन्हें अच्छी तरह प्रशिक्षित कर कोई नृशंस अपनी तिजाेरी भर रहा था।
यह भी संभव है कि उन्हें नशा भी दिया जाता हो।
और यह वाकया सिर्फ दिल्ली या किसी एक जगह का नहीं है बल्कि अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे नजारे दिख ही जाते हैं।
कई बार इनके गिरफ्त में विदेशी मेहमान भी आ जाते हैं जिनके मन में भारत की नकारात्मक छवि सदा के लिए कायम हो जाती है।
वहीं दूसरी तरफ कबूतरों के बीच बैठा कचरा चुनने वाला बच्चा सर्दी और धूप की परवाह किए बिना अपने और संभवतः अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी चुन रहा था।
कचरे के ढेर में उसे वो निवाला दिख रहा था जो उसे रात को हासिल होने वाला था।

दोनों ही मामलों में अगर कोई चीज दांव पर भी तो वो था अनमोल बचपन।
जिसे आगे चलकर अपने, अपने परिवार, समाज और देश के लिए एक सुनहरा भविष्य बुनना था वो शिक्षा और संसाधनों से विहीन बालक एक ऐसे काम में लगा दिया गया था जो उसे मुश्किल से दो वक्त की रोटी तो दे सकता था लेकिन सपने देखने की आजादी छीन चुका था।
तरह – तरह के वादे – इरादे दिखाने वाली सरकारें, प्रशासन, बच्चों के हितैषी दिखने वाले संगठनों को ऐसे बच्चे आखिर कब दिखेंगेॽ
कानून तो देश में बहुतायत हैं लेकिन उन कानूनों का पालन कराने की इच्छाशक्ति कब देखने को मिलेगीॽ
कब तक बचपन यूं ही खाक छानता रहेगाॽ
कब तक हम और आप ʺये लोग ऐसे ही हैं‘ कहकर अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहेंगेॽ
आखिर कौन हैं– ʺये लोग‘ॽ
अगर आपके पास जवाब हो तो मुझे भी बताइएगा।
इन्हीं सवालों के साथ ये अंक यहीं तक।
आप सबके विचार और सुझाव सादर आमंत्रित हैं।

7 Comments

  1. आपके विचार और अनुभव को पढकर मन चिंतित होता है और कुछ करने के लिए मन तडपता है, लेकिन समझ नहीं आता है कि क्या करें? 😐

    Liked by 1 person

    1. यही हालत लगभग हम सभी की है
      सोच में बहुत कुछ है लेकिन करने के नाम पर बहुत सोचना पड़ता है

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  2. कई बार दोस्तों से इसलिए भी डांट खाई हूँ कि इनको पैसे देना एक गिरोह को मदद करने के बराबर है।

    Liked by 1 person

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