विचार श्रृंखला – 39

आधुनिक मानव और खुशियों का रिमोट

आजकल एक बड़ा ही विचित्र सा दौर चल पड़ा है – खुद की सोच को सबसे अच्छा मान लेने या यूं कहें तो थोप देने का दौर।

तकनीक के बढ़ते उपयोग ने एक तरफ जहां सोशल मीडिया के रुप में मुक्त अभिव्यक्ति का एक जबरदस्त साधन हर हाथ को उपलब्ध कराया है वहीं दूसरी तरफ इंसानी दिलों के बीच की दूरी को कई गुना बढ़ाने का भी काम किया है। आधुनिक दौर में एक तरफ जहां जिंदगी के हर सेकेंड में लोग भागते हुए नजर आते हैं वहीं दूसरी तरफ मौका मिलते ही सोशल मीडिया की दुनिया में खो जाते हैं। मेरा खुद से और आप सबसे एक बड़ा ही अजीब सा सवाल है – हम में से कितने लोग वास्तव में सोशल मीडिया के मित्रों से जुड़ पाते हैं या आत्मीयता का अनुभव कर पाते हैं? आइए एक विश्लेषण करते हैं–

दुनिया की मारामारी से अलग होने पर हम में प्रत्येक व्यक्ति एक बार यह जरुर सोचता है कि वह वास्तव में क्या कर रहा है और किसके लिए कर रहा है। एक दूसरा तबका ऐसे लोगों का भी है जो यह महसूस करते हैं कि वे अपनी क्षमता के अनुसार कर तो सब कुछ रहे हैं लेकिन उन्हें उस मात्रा में सम्मान या प्यार प्राप्त नहीं होता जिसके हकदार वो स्वयं को मानते हैं। ऐसी सोच के दिमाग में आने के बाद अगला क्रम होता है किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करना जो उन्हें उनकी भावनाओं के अनुरुप समझ सके और उन्हें उस तरीके से सुन सके जिस तरीके से वे सुनाना चाहते हैं। कुछ मामलों में यह तलाश पूरी भी हो जाती है लेकिन अधिकांश कोई ऐसा “हमदर्द” ढूंढने में विफल रहते हैं और पल – पल घुटते रहते हैं।

ऐसे ही एक तबका उन लोगों का भी है जो भावनाओं और काम के बोझ के बीच एक ऐसी मानसिकता का शिकार हो जाते हैं जिसमें उन्हें लगने लगता है कि उनके बिना उनसे जुड़े लोगों का काम ही नहीं चल सकता। यह मानसिकता कुछ समय बाद एक ऐसी खीझ को जन्म देती है जो उन्हें सोचने पर विवश करती है कि उनको जरुरत से ज्यादा काम देकर बाकी के लोग तो बस मजे कर रहे हैं।

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वभाव से बड़े कोमल और भावुक होते हैं। ऐसे लोगों के लिए उनका कर्तव्य और जिम्मेदारी सर्वोपरि होती है। अपनी जिम्मेदारियों और भावनाओं के प्रति विवश ऐसे लोग कई बार सबको खुश करते करते खुद की ही खुशी खो देते हैं और फिर एक बीच का रास्ता चुनकर अपनी खुशियों और इच्छाओं का गला घोंट देते हैं।

अब बारी आती है फ्रेंड लिस्ट में शामिल हजारों लोगों और कॉन्टेक्ट लिस्ट में शामिल सैकड़ों नामों की। जब उपरोक्त में से कोई व्यक्ति अपने आसपास एक कंधा ढूंढता है तो इनमें से कोई भी उसे इतना भरोसेमंद नहीं लगता कि उसके सामने अपना दिल खोल कर रख सके। कभी वह परिवार की तरफ देखता है तो कभी समाज की तरफ। कभी बचपन को याद करता है तो कभी दुनिया में ही दुनिया की खुशी ढूंढने की कोशिश करता है। कई बार वह खुशी की तलाश में इतना बेसब्र हो जाता है कि वह कब नाना प्रकार के नशे और उनसे उत्पन्न होने वाले अपराधों की चपेट में आ जाता है, उसे खुद भी पता नहीं चल पाता। पुराने मित्रों से दूरी हो ही चुकी होती है और ऑनलाइन मित्र सिर्फ लाइक और कमेंट करने तक ही खुद को सीमित रखना पसंद करते हैं। परिवार से दूरी तो गुजरे जमाने की बात हो चुकी होती है या यूं कहें कि कई बार उनकी परेशानी की वजह ही परिवार में छ्पिी रहती है। अब इंसान ऐसी परिस्थिति में जाए तो कहां जाए? तब दौर शुरु होता है बेचैनी, चिड़चिड़ापन, अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति का। कुछ लोग खुद का जीवन समाप्त कर भी लेते हैं और बाकी के लोग नाना प्रकार की बीमारियों के चपेट में आकर तिल तिलकर मरते हैं।

इन सबके बीच जो सबसे बड़ी बात छूट गई होती है, वह है– आत्मावलोकन की कमी। हम में से कोई कभी यह समझने की कोशिश नहीं करता कि मशीनों के साथ जीते जीते हम खुद उनकी तरह व्यवहार करने लगे हैं। आखिर संगत का असर तो पड़ता ही है न। हर मशीन को रिमोट से चलाते चलाते हमने खुद की खुशी का रिमाट कंट्रोल भी किसी अंजान के हाथों में पकड़ा दिया है जिसे हम न तो जानते हैं और न ही पहचानते हैं। यहां आप यह सोच सकते हैं कि अपना परिवार और मित्र तो आपके जाने पहचाने हैं फिर मैं सबको अंजान क्यों कह रहा है। तो ऐसी सोच के स्वाभाविक वाहक मित्रों से मेरा सिर्फ यही कहना है कि यदि वही जाने – पहचाने लोग आपके दुख का कारण है तो आपको वास्तव में उन्हें या तो फिर से जानने पहचानने की जरुरत है या फिर उनके हाथ से अपनी खुशियों का रिमोट कंट्रोल वापस छीन लेना ही श्रेयस्कर है क्योंकि अगर आप उन्हें वास्तव में जानते पहचानते होते तो फिर क्या शिकवे और क्या विवाद।

सच्चाई तो यह है कि हम लोग जब खुद के जीवन की गतिविधियों के साथ तालमेल बिठा पाने में खुद को असक्षम पाते हैं तो एक बहाने की तलाश करते हैं जिसके सिर पर अपनी नाकामियों का ठीकरा फोड़ा जा सके। कभी यह बहाना काम के रुप में सामने आता है तो कभी पारिवारिक जिम्मेदारियों के नाम पर। कभी यह बहाना समय की कमी का होता है तो कभी एकाग्रता की कमी का। कभी यह बहाना जीवन की उलझनों का होता है तो कभी दुनिया की भागदौड़ का। कभी यह बहाना अपने समकक्ष से तुलना के रुप में सामने आता है तो कभी झूठे आरोपों का भी सहारा लिया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि कोई “अपना” कब और किस वजह से दूर होने लगता है इसका पता भी नहीं चल पाता। कई बार रिश्ते और संबंध एकतरफा निभाए जाते हैं लेकिन दूसरे पक्ष के शिकवे कम होने का नाम नहीं लेते। कई बार स्पष्ट दिखाई देता है कि सामने वाला आपके साथ संबंध को कोई खास महत्व नहीं दे रहा लेकिन फिर “सामाजिक विवशता” के नाम पर रिश्ते निभाए जाते हैं। और इन सभी “मजबूरी के रिश्तों” को निभाते निभाते और खुद को लुभाने के लिए बहाने बनाते बनाते हम कब खुद की खुशी का रिमोट कहीं गुम कर देते हैं, पता ही नहीं चल पाता।

तो चलिए ढूंढते है – अपनी खुशियों का गुम हो चुका रिमोट और अगर आप वास्तव में खुश हैं तो एक बार आत्मावलोकन अवश्य करें कि कहीं किसी अपने की खुशियों का रिमोट आपके पास तो नहीं रह गया है।

© अरुण अर्पण

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