श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

योगीराज कृष्ण – मिथक बनाम तर्क

उपहास तेरे रास का संसार ने खुलकर किया
पर प्रेम की पराकाष्ठा पर ध्यान ना दिया।
तुमने बचाई लाज एक नारी की दुष्टों से
फिर भी तुझे संसार ने बदनाम ही किया।
एक प्रश्न है मेरा समझदारों की दुनिया से
देखा क्या कोई रास माता का एक बच्चे से?
ग्यारह की वय में कंस का संहार कर दिया
उस उम्र की लीला को तुमने रास कह दिया?

थीं कैद में पापी के राजाओं की कन्याएं
जिनको छुड़ाया कृष्ण ने हर प्राण दुष्टों के।
था कोई क्या जो कह सके रानी उन्हें उस दौर में
तब कृष्ण ने रानी बना रखा उन्हें निज ठौर में।
नहीं वासना थी कर्मयोगी के किसी क्षण में कभी
एक सोच थी सम्मान हर नारी को मिल जाए यहां।
गर वासना का भाव होता क्षणिक भी मन में कभी
सोलह हजार के पुत्रों का उल्लेख क्या जन में कहीं?

धृतराष्ट्र के दरबार में अंधेर थी भारी बड़ी
था पुत्र के वशीभूत अंधा और सभा थी चुप खड़ी
चौसर की बाजी हार कर जब राज्य खोया धर्म ने
पत्नी लगी जब दांव पर संसार रोया मर्म में
जब राज्य ने मुंह मोड़ कर होने दिया था वो अनर्थ
तब नारी को नारायण में ही मिल गया हर एक अर्थ
भागे चले आए थे साड़ी को बनाया था अनंत
व्यभिचारी से उम्मीद क्या रखता कोई इसका भी जग?

जब राज्य और जन बन गए
अविजित, अराजक और कुटिल
चौंसठ कलाओं में दिखी थी एक कला ये भी कठिन
पहले महाभारत किया और सूत्रधार थे खुद बने
गीता में वो सब ज्ञान था जिसके बिना हर जन मरे
खुद बीज बोया नाश का श्रृष्टि की रक्षा के लिए
कोई है जो मारे स्वयं को जनता की रक्षा के लिए?
थे योगीराज और योग के पहले वो उन्नायक बली
संसार अब तक लाभ लेता स्वास्थ्य का हर एक घड़ी

विश्वास को तर्कों के पलड़े में जो रखते हैं, सुनो
तर्कों की सीमा तोड़ कर निष्पक्ष तर्कों को बुनो
व्यभिचार का करते समर्थन कृष्ण को रख सामने
बस नाम राधा का जुड़ा क्यों कृष्ण नाम के सामने
व्यभिचार बन सकता नहीं सुकुमार प्रेमी का विकल्प
करते कुकर्म तो मान लो छोड़ो कुतर्कों का प्रकल्प
गुण को बना अवगुण दिखाना छोड़ दो अब कृष्ण का
आओ मनाएं जन्मदिन सोल्लास प्यारे कृष्ण का

कृष्ण रस में सराबोर भक्तजनों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

यह कविता जिन लोगों को लक्ष्य करके लिखी गई है, उन्हें भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की विशेष शुभकामनाएं साथ ही यह उम्मीद भी करता हूं कि ऐसे जन एक बार आत्मावलोकन अवश्य करेंगे और श्रीकृष्ण के ग्राह्य गुणों और आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करेंगे।

श्रीकृष्ण से बड़ा राजनीतिज्ञ भी आज तक कोई नहीं हुआ। श्रीकृष्ण से बड़ा कर्मयोगी भी धरा पर दोबारा नहीं जन्मा। श्रीकृष्ण जैसा निष्कपट प्रेमी भी शायद ही कोई उत्पन्न हुआ हो। श्रीकृष्ण जैसा योद्धा भी दुर्लभ है। श्रीकृष्ण जैसा आत्मज्ञानी होना भी मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। श्रीकृष्ण जैसा मित्र मिलना भी आज के दौर में लगभग असम्भव सा है। और भी अनेकों गुण हैं जो श्रीकृष्ण के जीवन लीलाओं से सीखे जा सकते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण हम सबके हृदय को निष्कपट और प्रेममय बनाएं, इसी कामना के साथ एक बार फिर आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

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