विचार श्रृंखला – 32

कश्मीर और अनुच्छेद 370 – एक विश्लेषण

आज की तिथि में वैश्विक पटल पर एक अत्यंत गंभीर मुद्दा चर्चा में है – भारत की संसद द्वारा अनुच्छेद 370 और 35-ए में संशोधन के फलस्वरूप जम्मू और कश्मीर की वर्तमान स्थिति। भारत सरकार ने एक नीतिगत फैसला लेते हुए संसद में एक प्रस्ताव के माध्यम से जम्मू – कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रभाव को न केवल सीमित कर दिया बल्कि जम्मू – कश्मीर और लद्दाख नामक दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित भी कर दिया। जम्मू – कश्मीर जहां एक विधायिका के साथ केंद्र शासित प्रदेश होगा वहीं लद्दाख में विधायिका नहीं होगी। इस फैसले के साथ ही इस राज्य के सभी महत्वपूर्ण फैसलों में केंद्र सरकार प्रत्यक्ष भूमिका में अा गई। भारत सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर इतना बड़ा कदम उठाकर यह साबित कर दिया कि संकल्पशक्ति, दृढ़ता और साहस के बल पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। यह मुद्दा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ा महत्व रखता है अतः यह जरूरी है कि हम सब इसके बारे में एक सामान्य तथ्यात्मक समझ जरूर रखें ताकि किसी भी प्रकार के भ्रम या अफवाह की स्थिति से बचा जा सके। इस लेख में हमारा यह प्रयास होगा कि हम आपके समक्ष इस मुद्दे से जुड़े सभी पहलुओं को रख सकें। इस लेख के माध्यम से हम आपके समक्ष भारत के फैसले से पहले और बाद की स्थिति के साथ साथ पड़ने वाले प्रभाव की भी विशेष रूप से चर्चा करेंगे।

  • क्या कहती है राष्ट्रपति की अधिसूचना –
    • आदेश का नाम – संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश, 2019
    • तत्काल प्रभाव से लागू, संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश 1954 पर प्रभावी
    • संविधान के सभी उपबंध समय – समय पर संशोधन के साथ जम्मू और कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में लागू होंगे तथा अनुच्छेद 367 में निम्नलिखित धाराएं जोड़ी जाएंगी –
      • भारतीय संविधान या उसके उपबंधों को जम्मू कश्मीर में लागू संविधान और उसके उपबंध का निर्देश माना जाएगा
      • राज्य विधानसभा की सिफारिश पर राष्ट्रपति की ओर से जम्मू – कश्मीर के सदर – ए – रियासत के पद पर नियुक्त व्यक्ति के लिए जारी समस्त निर्देशों को जम्मू – कश्मीर के राज्यपाल के लिए जारी निर्देश माना जाएगा
      • राज्य की सरकार के निर्देशों को, उनकी मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य कर रहे जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल के लिए निर्देशों को शामिल करता हुआ माना जाएगा।
      • राज्य की संविधान सभा को अब राज्य की विधानसभा के रूप में जाना जाएगा
  • स्रोत – राष्ट्रपति द्वारा 5 अगस्त को जारी मूल आदेश

आइए एक नजर डालते हैं इस फैसले से पहले और बाद की स्थिति पर –

  • दोहरी नागरिकता पर असर –
    • जम्मू – कश्मीर में पहले दोहरी नागरिकता का प्रावधान था जो इस फैसले के बाद समाप्त हो जाएगा और जम्मू – कश्मीर के निवासियों के पास भी सिर एक नागरिकता होगी – भारत की नागरिकता
  • संविधान और ध्वज –
    • अभी तक इस राज्य में अलग संविधान और अलग ध्वज होता था लेकिन अब इस राज्य में भारत का संविधान और ध्वज पूर्ण रूप से लागू होगा। साथ ही राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अब अपराध माना जाएगा
  • सम्पत्ति और व्यापार –
    • प्रदेश के बाहर के लोगों को राज्य में जमीन खरीदने, सरकारी नौकरी पाने, व्यापार करने और संस्थानों में दाखिला लेने का अधिकार अभी तक नहीं था लेकिन अब देश के अन्य राज्यों के लोग भी यहां संपत्ति की खरीद, व्यापार या नौकरी की प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे
  • विधानसभा की स्थिति –
    • पहले जम्मू – कश्मीर की विधान सभा का कार्यकाल 6 साल का होता था तथा संसद यहां के मामले में बहुत सीमित दायरे में ही कानून बना सकती थी। राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति होती थी। नए परिदृश्य में जम्मू – कश्मीर और लद्दाख नामक दो केंद्रशासित प्रदेश होंगे जिनमें से जम्मू – कश्मीर के पास दिल्ली की तरह ही एक विधानसभा होगी जबकि लद्दाख पूर्ण केंद्रशासित प्रदेश बन जाएगा। जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 5 साल का होगा और संसद द्वारा बनाए गए कानून की मान्यता इस राज्य में भी अन्य राज्यों की तरह ही होगी। इससे पहले रक्षा, विदेश मामले और संचार के अलावा किसी भी कानून को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार से मंजूरी की आवश्यकता होती थी। जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनते ही वहां राज्यपाल की जगह उपराज्यपाल की नियुक्ति होगी जबकि लद्दाख में शासन के प्रमुख प्रशासक होंगे।
  • पुलिस और व्यवस्थापिका –
    • राज्य की पुलिस का नियंत्रण अब केंद्र सरकार के पास होगा तथा जम्मू – कश्मीर कैडर के आईएएस और आईपीएस अधिकारी अब यूटी कैडर के अधिकारी बन जाएंगे
  • महिलाओं के अधिकार –
    • राज्य की महिला द्वारा अन्य राज्य के पुरुष से विवाह के उपरांत राज्य में उसकी नागरिकता और संपत्ति का अधिकार छीन लिया जाता था जो इस फैसले के बाद सुरक्षित हो गया है और इन दोनों ही तत्वों पर अब कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा
  • पाकिस्तान को विशेषाधिकार की समाप्ति –
    • राज्य की महिला द्वारा किसी पाकिस्तानी नागरिक से विवाह करने पर उस पाकिस्तानी नागरिक को भी जम्मू – कश्मीर की नागरिकता मिल जाती थी लेकिन इस फैसले के बाद पाकिस्तानी नागरिकों को मिला यह विशेषाधिकार भी समाप्त हो जाएगा
  • राष्ट्रपति शासन या राज्यपाल शासन –
    • अभी तक इस राज्य में राज्यपाल शासन की व्यवस्था थी किन्तु नए परिदृश्य में संसद का अनुच्छेद 356 इस राज्य में भी लागू होगा और वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकेगा
  • अल्पसंख्यकों को आरक्षण –
    • जम्मू – कश्मीर में हिन्दू, सिख आदि अल्पसंख्यकों को 16 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिलता था लेकिन नए परिदृश्य में अल्पसंख्यकों को आरक्षण का लाभ दिया जा सकेगा
  • विभिन्न कानूनों और संस्थाओं की स्थिति –
    • पहले राज्य में सूचना और शिक्षा का अधिकार एवं सीएजी जैसी संस्थाओं की प्रासंगिकता नहीं थी लेकिन अब भारत के नागरिकों के लिए लागू सभी अधिकार, कानून और संस्थाओं का प्रभाव जम्मू – कश्मीर राज्य पर भी होगा।
    • पहले राज्य में रणवीर दंड संहिता लागू थी लेकिन अब यहां भारतीय दंड संहिता लागू होगी और इसमें होने वाले सभी संशोधन अपने आप जम्मू कश्मीर में भी लागू हो जाएंगे
  • मतदान का अधिकार –
    • पहले इस राज्य में अन्य राज्य के निवासियों को चुनाव लडने या मतदान करने का अधिकार नहीं था लेकिन अब भारत के किसी भी राज्य का व्यक्ति यहां चुनाव लड़ सकता है और मतदान भी कर सकता है
  • सुप्रीम कोर्ट की उपयोगिता –
    • पहले यहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले लागू नहीं होते थे लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले यहां भी शेष भारत की तरह ही मान्य होंगे।

अनुच्छेद 370 का ऐतिहासिक परिदृश्य –

  • राज्य के लिए अनुच्छेद 370 को महाराजा हरि सिंह द्वारा विशेष दर्जे की मांग से जोड़कर देखने वालों के लिए यह जान लेना भी जरूरी है कि 1930 के दशक में हुए गोलमेज सम्मेलन में महाराजा हरि सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि भारत जब एक स्वतंत्र राष्ट्र बनेगा तब वह उसका हिस्सा बनेंगे
  • महाराजा के इस रुख का बहुत ज्यादा विरोध हुआ और लाहौर तथा पश्चिमी पंजाब से बड़ी संख्या में लोगों का कश्मीर में आगमन हुआ जिसने 1931 के दंगो की जमीन तैयार की।
  • मुस्लिम कॉन्फ्रेंस नामक संगठन ने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में घाटी में तेजी से विस्तार किया तथा शेख अब्दुल्ला ने लाहौर, अलीगढ़ समेत अनेक राज्यों में स्थित अपने संपर्कों तथा पंडित नेहरू के साथ अपने रिश्तों का पूरा फायदा उठाया। संगठन को राजनैतिक विस्तार देने तथा गैर मुस्लिमों को जोड़ने के लिए संगठन का नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस कर दिया गया। इस बीच आजादी भी मिली लेकिन पिछले दो दशक में सांप्रदायिक राजनीति ने वो जहर बोया जिसकी कल्पना स्वयं महाराजा हरि सिंह ने भी नहीं की थी।
  • मजहब के आधार पर हुए बंटवारे में किसी एक पक्ष को चुनना महाराजा के लिए न्यायसंगत नहीं था क्योंकि जिस आबादी का वो नेतृत्व करते थे उसमें दोनों ही धर्मों के लोग बड़ी संख्या में शामिल थे। ऐसी परिस्थिति में महाराजा ने मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हुए दोनों देशों के साथ यथास्थिति कायम रखने का समझौता किया।
  • इससे पहले कि महाराजा कोई निश्चित फैसला कर पाते, पाकिस्तान ने समझौते को तोड़ते हुए अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर हमला कर दिया।
  • 23 सितम्बर 1947 को सरदार पटेल ने पंडित नेहरू को कश्मीर के विलय पर उचित कदम उठाने की सलाह दी थी। साथ ही साथ पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर हमले की आशंका की सूचना महाराजा हरि सिंह को भी दी गई थी लेकिन पाकिस्तान द्वारा इतनी जल्दी धोखा देने की उम्मीद उन्होंने नहीं की थी
  • 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी सेना ने कबायली ताकतों के साथ मिलकर पुंछ के एक इलाके को कब्जे में ले लिया और 24 अक्टूबर को बारामूला तक पहुंच गए।
  • महाराजा ने भारत से संपर्क किया और सदमे की स्थिति में श्रीनगर छोड़कर जम्मू चले गए
  • उन्होंने अपने एडीसी को आदेश दिया कि भारत द्वारा विलय प्रस्ताव पर नकारात्मक जवाब आने की स्थिति में वह उन्हें गोली मार दे।
  • इसी बीच राज्य के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन और भारत के गृह सचिव वीपी मेनन के आपसी समन्वय से विलय की रूपरेखा तैयार की गई तथा महाराजा के सामने शर्त रखी गई कि वे शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन करें।
  • 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा ने इस विलय प्रस्ताव (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर कर दिया और 27 अक्टूबर 1947 को लॉर्ड माउंट बेटन द्वारा मंजूरी के साथ ही जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया
  • इस तमाम घटनाक्रम में भारतीय संविधान में कहीं भी अनुच्छेद 370 नामक हिस्सा अस्तित्व में नहीं था

कहां से आया अनुच्छेद 370

  • विलय पर भारत की स्पष्ट नीति थी कि किसी भी विवाद की स्थिति में रियासत के राजा के मनमाने फैसले की बजाय जनभावना को वरीयता दी जाएगी
  • लॉर्ड माउंट बेटन ने विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते समय कहा था कि सरकार की इच्छा है कि राज्य में शांति बहाली तथा घुसपैठियों को भगाने के बाद वहां के अवाम की इच्छा के मुताबिक ही विलय की कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी
  • 1948 में भारत सरकार के श्वेत पत्र में विलय को पूर्ण रूप से अस्थाई और तात्कालिक बताया गया
  • अनुच्छेद 370 का मूल मसौदा जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा ही प्रस्तुत किया गया जिसके बाद अनुच्छेद 306 ए में बदलाव के लिए इसे संविधान सभा में पारित कराया गया। भारतीय संविधान सभा द्वारा 17 अक्टूबर 1949 को इसे पारित करते हुए अनुच्छेद 370 के रूप में संविधान में जोड़ा गया।
  • अनुच्छेद 370 को लागू करते समय पंडित नेहरू ने कहा था कि यह एक अस्थाई प्रावधान है जो समय के साथ क्षीण होता चला जाएगा किन्तु सियासतदानों की सियासत ने ऐसा गुल खिलाया कि यह उत्तरोत्तर मजबूत होता गया और नासूर बन गया
  • संविधान निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 370 का मसौदा तैयार करने से साफ इंकार कर दिया था
  • अम्बेडकर के इनकार के बाद पंडित नेहरू के निर्देश पर गोपालस्वामी अयंगर ने यह मसौदा तैयार किया था
  • नेहरू ने सरदार पटेल को सूचित किए बिना ही शेख अब्दुल्ला के साथ मिल कर मसौदे को अंतिम रूप दे दिया
  • प्रस्ताव के संविधान सभा में पेश करने के समय नेहरू अमेरिका चले गए थे और इस प्रस्ताव को सदस्यों ने फाड़ दिया था
  • हालात बिगड़ते देख अयंगर पटेल के पास गए और उनसे कहा कि यह मामला नेहरू के अहम से जुड़ा हुआ है तथा नेहरू ने शेख को पटेल के हिसाब से फैसले लेने को कहा है। इसके बाद पटेल ने मसौदे को मंजूर कर लिया
  • कांग्रेस कार्यकारिणी में भी पटेल द्वारा पेश उस मसौदे का देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताते हुए भारी विरोध हुआ लेकिन अंततः यह मसौदा पारित कर लिया गया और नेहरू के अहम ने देश की संप्रभुता पर विजय प्राप्त की

आप चाहते हैं कि भारत जम्मू कश्मीर की सीमा की रक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे और अनाज की सप्लाई करे। साथ ही कश्मीर को भारत के समान अधिकार मिले। लेकिन आप चाहते हैं कि कश्मीर में भारत को सीमित शक्तियां मिलें। ऐसा प्रस्ताव भारत के साथ विश्वासघात होगा जिसे कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्वीकार नहीं करूंगा

शेख अब्दुल्ला को लिखे पत्र में भीमराव अम्बेडकर

माउंट बेटन ही वो व्यक्ति थे जिन्होंने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र ले जाने के लिए नेहरू को राजी किया था। यही कारण है कि पाकिस्तान बार बार उल्लेख करता है कि भारत ही कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र लेकर गया था।

कैसे हटा अनुच्छेद 370

  • वास्तव में अनुच्छेद 370 हटाया ही नहीं गया है। संविधान के एक अनुच्छेद के रूप में इसका अस्तित्व अभी भी कायम है। हालांकि अनुच्छेद 370 के आत्मघाती खंड 3 द्वारा राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए इसे निष्क्रिय कर दिया गया है।
  • संविधान के किसी भी अनुच्छेद को समाप्त करने के लिए अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन की जरूरत होती है लेकिन अनुच्छेद 370 (3) का प्रयोग करके सरकार ने बड़ी चतुराई से संशोधन के मार्ग को दरकिनार करते हुए अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय कर दिया
  • अनुच्छेद 370(3) भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह इस अनुच्छेद के निष्क्रिय होने या किसी अपवाद या संशोधन के साथ सक्रिय होने की घोषणा सिर्फ एक अधिसूचना के माध्यम से कर सकते हैं।

वर्तमान परिदृश्य

  • इस फैसले के साथ ही पड़ोसी देश पाकिस्तान के सीने पर सांप लोटने लगा और उसने तत्काल हाहाकार मचाना शुरू कर दिया।
  • त्वरित प्रतिक्रिया के तहत उसने भारत के साथ राजनयिक संबंध सीमित कर दिए और भारत के उच्चायुक्त को वापस भेज दिया
  • साथ ही भारत के साथ व्यापारिक संबंध भी बाधित किए गए और परिणामस्वरूप नान और दाल के दाम तय करने पर मजबूर पाकिस्तानी कैबिनेट के सामने टमाटर भी एक चुनौती बन गया
  • समझौता एक्सप्रेस रद्द कर दी गई और वायु क्षेत्र का भी एक हिस्सा बंद कर दिया गया
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी और संयुक्त राष्ट्र समेत उसके सबसे बड़े सरपरस्त चीन ने भी इसे द्विपक्षीय मसला बताते हुए शिमला समझौते के तहत हल करने का सुझाव दे डाला। दूसरी तरफ रूस जैसे देश खुलकर भारत के समर्थन में खड़े हो गए।
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियां एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं ताकि इस फैसले को पलटने में कामयाबी मिल सके। हालांकि इसकी संभावना ना के बराबर है क्योंकि संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत के साथ पारित बिल तथा संवैधानिक प्रावधानों के तहत जारी राष्ट्रपति की अधिसूचना को असंवैधानिक करार देने के लिए कोई ठोस आधार उपस्थित नहीं है।
  • संसद में प्रस्ताव लाने से पहले ही कश्मीर में तैयारी पूरी कर ली गई थी इसलिए अभी तक वहां के किसी भी हिस्से से कोई हिंसक वारदात सामने नहीं आई है और आगे भी उम्मीद है कि देशभक्त कश्मीरी मुख्यधारा में शामिल होते हुए विकास के मार्ग का अनुसरण करेंगे।

कुल मिलाकर कश्मीर के विलय की जो प्रक्रिया 1948-49 में अधूरी रह गई थी उसे अंत में पूरा कर लिया गया है। जम्मू कश्मीर अब भारत का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। 31 अक्टूबर 2019 से भारत गणराज्य में दो नए केंद्र शासित प्रदेशों का उदय होगा – जम्मू कश्मीर और लद्दाख। उम्मीद है कि यह उदय घाटी और लद्दाख में विकास के नए कीर्तिमान स्थापित करेगा और धरती का स्वर्ग कश्मीर एक बार फिर हिंसा की राह छोड़कर उन्नति के शिखर पर स्थापित होगा।

Image credit – the federal

16 Comments

      1. आपकी सहृदयता है 😊🙏
        लिखने का समय मिले या न मिले लेकिन मेरी कोशिश रहती है कि आप सभी मित्रों की कोई पोस्ट मिस न हो जाए
        मैं आप सबकी हर पोस्ट पढ़ता जरूर हूं

        Liked by 1 person

      2. तभी तो सर जी हम आपको याद करते हैं ,हृदय सर आभार🙏, हमे भरोसा रहता है कि आपका लाइक पक्का मिलेगा । और मिलता भी है ।

        Liked by 1 person

  1. बहुत अच्छा- अतिसुन्दर लेख । पांडेय जी।

    Liked by 1 person

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