काव्य श्रृंखला – 32

भाव बनाम कर्म – एक क्षमा याचना

कुछ ऐसे मौके आते हैं, जीवन की चलती राहों पर
आदर्श नहीं टिक पाता है, अपने कर्मों के घावों पर
है सरल बहुत बातें करना, रख दया भाव हर प्राणी पर
करने की बात जब आती है, रखते आदर्श आलमारी पर

कल राह पड़े मिल गए थे तुम, हे पंछी दुर्घटना से ग्रसित
थी सांस मगर असहाय पड़े, टूटे पैरों के पीर लसित
कुछ साथी तुम्हारे साथ खड़े, पर स्ट्रेचर ना था उपलब्ध
ची ची करते घेरे निर्बल, असहाय खड़े सब थे स्तब्ध

शायद उनको उम्मीद रही, कि, कोई मानव रुक जाएगा
घायल साथी के जख्मों पर, कोई मरहम तो लगाएगा
शायद मिल जाए गगन फिर से, जीवन में बेचारे साथी को
शायद कोई उनको उपहार, मित्रता दिवस का दे जाएगा

दुर्भाग्य प्रबल, थे पंख मगर, लेकर उड़ने की कला ना मिली
निष्ठुर मानव से दया नामक व्यवहार की कोई सिला न मिली
मैं भी उस भीड़ का हिस्सा हूं जिसने डाली बस एक नजर
थी सोच मगर कोशिश न किया, आंखों में नींद न आई मगर

हूं क्षमा प्रार्थी उस ईश्वर से जिसकी रचना से बने हम तुम
हूं क्षमा प्रार्थी उस पंक्षी से जिसको फिर गगन नसीब नहीं
हूं क्षमा प्रार्थी उन मित्रों से जो साथी के संग अडिग रहे
हूं क्षमा प्रार्थी अपने मन से, सोचा पर कर्म के संग नहीं

Image – Google images

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