मातृ दिवस पर सभी माताओं को नमन

मातृत्व को नमन – एक अधूरी कविता

तमन्ना मेरे मन में उस दिन से ही थी
उठाया था जिस दिन कलम को करों में
बने एक लहरी कभी तो स्वरों की
जो मां को समर्पित हो उनके दरों पे

मिले ना कभी शब्द जिनके सहारे
मैं लिख दूं कि मां की क्या महिमा निराली
कभी जो किया कोई साहस हृदय से
मिले गोंद मां की यही बात सूझी

ना मुझको पता ना है हिम्मत जो समझूं
कि कैसे उन्होंने था नौ माह ढोया
करुण क्रंद करते हैं छोटी पीड़ा पर
उन्होंने तो पूरा ही यौवन है खोया

ना देखा कभी भी है साड़ी की कीमत
लगे चोट थोड़ी भी तो वो हैं रोती
भले खुद मिले उनको भोजन थोड़ा सा
मगर कम पड़ी ना कभी हमको रोटी

अगर पूछ बैठे कि क्या तुमने खाया
छिपा कर सभी भाव वो मुस्कुराती
नहीं भूख मुझको ना कर मेरी चिंता
यही कह कर ये बात वो टाल जाती

मुझे याद है अपने बचपन के वो दिन
जब पढ़ते थे हम लोग अपने घरों में
सभी काम घर के वो दिन रात करतीं
और तब तक न सोती थी जब तक हम पढ़ते

सुबह उठते ही जब हम क्लासेज को जाते
तो उठते ही मां को क्रियाशील पाते
नहीं याद कोई मुझे ऐसा भी दिन
जब मां ने टिफिन ना दिया घर से जाते

कोई दर्द हो या हो दिल में कोई गम
समझ जाती हैं वो बिना ही बताए
भले दर्द हो उनके पूरे बदन में
हमें चैन हो बस यही तो वो चाहें

सदा आगे बढ़कर के सब कुछ संभाला
कि हमको कभी कोई चिंता ना खाए
कमी ना हो कोई किसी भी तरह की
कभी दुख ना कोई भी हमको सताए

भले ना मिले कोई दुनिया का साधन
भले ना हो सोने का कोई आभूषण
उन्हें तो बस एक बात की ही है चाहत
रहें बच्चे खुश और प्रगतिशील हर पल

जहां भी रहें पाएं कोई भी मंजिल
वो सब कुछ तुम्हारे ही त्यागों का प्रतिफल
पिता कर्मयोगी थे अभी भी हैं संबल
तुम्हारा सहारा ही है अब तो हर पल

बढ़े शून्य बैंकों के खातों में प्रति क्षण
मगर कुछ कमी मुझको हर पल सताती
हूं पाता स्वयं को सदा निष्क्रमण जब
पवन भाव की है मेरे पास आती

समय के भंवर ने कुछ यूं खेल खेला
हृदय की तरंगों की हर राह तोड़ा
नहीं कर सका मैं कोई फर्ज पूरा
नहीं दे सका पंख सपनों को थोड़ा

नहीं जानता कैसे भूले है कोई
वो मां के सफर की निराली कहानी
वो ममता की छाया में जीवन गुजारे
मगर क्यों निकाले हैं मां को ही गाली

भले जाति कोई धरम या बसावट
मनुज हो या हो कोई चौपाया जीवन
नहीं कोई दूजा है ममता की भाषा
सदा से रही एक “मां” की परिभाषा

अभी भी बहुत कुछ है मन की धरा पर
मगर मां की ममता तुकों से परे है
किया आज साहस कि स्वर को संभालूं
मगर मां के आगे सभी स्वर अधूरे

नमन है तुम्हें मां हृदय से हमेशा
है चाहत न हो तेरे आंचल से दूरी
कभी ना कोई दुख तुम्हें छूने पाए
विधाता करें मेरी अरदास पूरी

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