विचार श्रृंखला – 26

विश्व पृथ्वी दिवस – एक चर्चा प्रकृति के साथ

यूं ही परसों दोपहर में सोचा कि चलो किसी परिचित से मिलकर आते हैं। बहुत दिनों से बुला भी रहे थे और साथ बैठकर जिंदगी के चंद लम्हे साझा करने का मौका भी मिलने वाला था। ऐसे काम के लिए रविवार का दिन सबसे ज्यादा मुफीद होता है। तो मेरे मौजी मन ने इस शुभ काम के लिए दोपहर का वक्त चुना। दस बजे सुबह जब मैं अपने कमरे से बाहर निकला तो मेरी आंखों के सामने चिलचिलाती धूप ने ऐसा मंजर बिखेरा जैसे वही चमकती रोशनी जीवन की अंतिम रोशनी हो और अगले ही क्षण आंखों के सामने कुछ पल का अंधेरा छा गया। कदम जब नीली चादर के तले कदमताल करने लगे तो मन ने एक बार कदम पीछे खींचने की हिमाकत की किन्तु अगले ही पल मस्तिष्क ने उन्हें आगे बढ़ने हेतु प्रेरित किया और मैं अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला।

रास्ते में कुछ दूरी पर गर्मी और धूप से त्रस्त होकर मैं एक वृक्ष की छाया में थोड़ी देर के लिए बैठ गया और तभी कानों में एक कराहती आवाज गूंजी।

आवाज – थक गए बेटा ?
मैं – ऐसा नहीं है, आज धूप थोड़ी तेज है और रास्ते में ये पेड़ दिख गया तो सोचा कि थोड़ा आराम कर लूं। मगर आप कौन हैं और दिखाई क्यों नहीं देती?
आवाज – यही तो तुम मनुष्यों की दिक्कत है बेटा! तुम्हें वही चीज सबसे कम दिखती है जो तुम्हारे सबसे काम की होती है। तुम्हें चाहिए तो सब कुछ लेकिन उसे देने वाले संसाधनों को बर्बाद करते समय तुम्हारी बुद्धि कहीं घास चरने चली जाती है।

मैंने आवाज के उद्गम का पता करना चाहा मगर कोई न दिखा। फिर मैं पूछ ही बैठा।

मैं – आपने अभी तक अपना परिचय नहीं दिया।
आवाज – बेटा! मैं वही प्रकृति हूं जहां तुम अभी खड़े हो। ग्लोबल वार्मिंग के सबसे जिम्मेदार लोगों में से एक तुम भी हो और उसी के घावों को लेकर कराहती हुई तुम्हारे चारों तरफ मैं ही तो हूं। फिर भी तुम मेरा परिचय पूछते हो! अभी तुम घर से निकले तो तुम्हें बहुत तेज धूप और गर्मी का अहसास हुआ और तुमने किसी पेड़ की छाया की तलाश शुरू कर दी। तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि अपने भाग्य से जीवित मेरा यह नुमाइंदा तुम्हें मिल गया और तुम उसकी छाया में बैठ कर आराम कर रहे हो। तुम लोग आज विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हो न?
मैं – हां, मगर आप तो प्रकृति हैं। आपको कैसे पता चला कि आज हम आपकी सुरक्षा के लिए विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हैं?
आवाज – तो तुम मुझे इतना मूर्ख समझते हो कि मुझे तुम्हारे ये ढकोसले समझ में नहीं आएंगे? दिन तो तुमने अपने जीवन में हर काम के लिए निर्धारित कर रखा है लेकिन दो मिनट की सेल्फी के बाद उस दिन का क्या महत्व रह जाता है, ये बात तुम भी बड़े अच्छे से जानते हो। दिन रात लड़ते हो लेकिन वेलेंटाइन डे को सेल्फी ऐसी लेते हो जैसे तुम्हारे दिन और रात का एकमात्र कारण तुम्हारा साथी ही है। मदर्स डे और फादर्स डे को सेल्फी लेने मात्र के लिए ही तुम्हें अपने मां बाप के साथ दो पल बिताने की फुरसत मिलती है। कई बार तो तुम सिर्फ उस सेल्फी के लिए ही उनसे मिलने वृद्धाश्रम जाते हो। नारा तो बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ का देते हो लेकिन अपने घर में ही बेटी को बोलने का भी अधिकार नहीं देते। आज का दिन तुमने मेरे लिए निर्धारित किया है तो मैं तुमसे पूछती हूं कि सोशल मीडिया पर विश्व पृथ्वी दिवस के संदेशों और उपदेशों की बाढ़ लाने के अलावा तुमने मेरे लिए आज वास्तव में क्या किया है? तुममें से कुछ लोग आज पौधे लगाएंगे, मैं उनकी शुक्रगुजार हूं। लेकिन सबसे ज्यादा शुक्रगुजार मैं उन चंद लोगों की हूं जो सिर्फ फोटोग्राफी के लिए पौधे नहीं लगाएंगे बल्कि उन्हें बढ़ने में उनकी मदद करेंगे और उनकी देखभाल करेंगे। तुम भी सोच रहे होगे कि  मैं कहां आकर तुमसे उलझ गई क्योंकि तुम मनुष्य सिर्फ तभी कुछ सोचते हो जब तुम्हारे शरीर को कोई कष्ट होता है। उस कष्ट से थोड़ा सा निजात मिलते ही तुम वापस अपने पुराने ढर्रे पर लौट जाते हो। चलो, सूरज कुछ देर के लिए बादलों की मेस में लंच ब्रेक पर गया हुआ है तो तुम भी अपने गंतव्य की तरफ बढ़ चलो। ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दें और सदा सुखी रखें।

इतना कहने के बाद वो आवाज चुप हो गई लेकिन मेरे मन को सोचने के लिए इतने सारे प्रश्न दे गई जिसका उत्तर शायद हम सबके पास है लेकिन हम उसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। प्रकृति की उस आवाज को हम हर रोज सुनते और महसूस करते हैं। उसकी कराहने की आवाज को अनसुना करने की हमने आदत बना ली है। उसके सुंदर स्वरूप को हमने इतना विकृत कर दिया है कि वो जब भी आइना देखकर गुस्से में आती है तो एक बड़े प्रलय के साथ हजारों लाखों जिंदगियों को तबाह कर जाती है। उस समय कुछ दिन के लिए हम फिर से विचारक बन जाते हैं और दो चार चर्चाओं के बाद पुनः प्रकृति के खिलाफ काम करने में जुट जाते हैं।

प्रकृति मां ने बिल्कुल सही कहा था कि किसी एक दिन को सांकेतिक महत्व देंने की बजाय अगर हम हर दिन थोड़ा थोड़ा भी प्रकृति को बचाने में अपना योगदान दें तो शायद अभी भी कुछ सुधार की गुंजाइश शेष है।

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