विचार श्रृंखला – 25

एक खुला खत – एक शहर और अपने प्यारे साथियों के नाम

प्रिय शहर

अभी कल की ही तो बात है, जब मैं और तुम पहली बार मिले थे। वैसे तो हम पहले भी कई बार मिलते रहे हैं लेकिन पहली बार कहने के पीछे कारण यह था कि हम कुछ पल साथ रहने वाले थे। इससे पहले जब भी मिले, बस मिले। एक दूसरे को करीब से जानने का मौका कल पहली बार मिला। वैसे तो तुम्हारे चाहने वालों की कभी कोई कमी नहीं रही। तुम अपने हर कद्रदान को उसकी इच्छा के अनुरूप ही मिले। जो तुमसे जिस उम्मीद से मिला, तुम उसकी हर उम्मीद के पूरक बने। मुझे याद है वो दिन, जब मैं अपने किशोरावस्था में पहली बार तुमसे मिला था। अभी बस 12 वीं पास करके ही तो आया था तुम्हारे पास, आगे की पढ़ाई की राह ढूंढने। हालांकि, उस वक्त विधाता की लेखनी मेरी किस्मत में तुम्हारा साथ लिखना भूल गई थी और फिर शुरू हुआ तुमसे छोटी छोटी मुलाकातों का एक अनवरत सिलसिला। कभी ट्रेन के इंतजार में तो कभी ट्रेन से गुजरते हुए। कभी किताबों की खोज में तो कभी परीक्षा की दौड़ में। हर बार किसी बड़े सपने की तलाश में एक छोटी यात्रा होती थी और तुम्हारे सानिध्य ने बहुत कुछ सिखाया और जीवन को एक नई ऊंचाई दी। फिर एक दिन तुमने मुझे वापस अपनी गोंद में बुलाया, इस बार हमारा सानिध्य पहले कि अपेक्षा थोड़ा लम्बा था। इस अवधि में तुमने जीवन के इतने रंग दिखाए कि कोई वर्णांध भी अपनी वर्णांधता से निजात पा जाता। बहुधा प्रकार के लोगों से मिलाया जिनमें कुछ हमेशा के लिए दिल के मेहमान बन गए तो कुछ लोगों ने अपने जहरीले स्वभाव की वजह से कभी भी याद न रखने योग्य पलों का सृजन किया। कुछ सोचे हुए काम बने तो कुछ बने हुए काम बिगड़े भी। लेकिन कुल मिलाकर तुमने मुझे वो सब कुछ दिया जिसकी एक व्यक्ति को जीवन के झंझावातों को पार करने के क्रम में सबसे अधिक जरूरत होती है। तुमने पृथ्वी के सबसे बड़े आयोजन और श्रद्धा के विहंगम श्रोत कुंभ के दर्शन और पवित्र अनुभव का सौभाग्य भी उपलब्ध कराया। आज जब एक बार फिर तुमसे बिछड़ने का समय आ गया है तो मन बड़ा द्रवित सा है। एक तरफ मेरे चाहने वालों से दूर जाने का गम है तो दूसरी तरफ नए स्थान पर उजालों की खोज करती एक दौड़ती नजर। एक तरफ तुम्हारा चिरपरिचित अपनापन है तो दूसरी तरफ नए लोगों में कोई अपना ढूंढने की चाहत। कहते हैं न कि “कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता” लेकिन तुम्हारे साथ मुझे जो कुछ भी मिला वो अनमोल था। हमारे मिलने जुलने का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

जीवन की इस भागदौड़ के साक्षी मेरे प्यारे साथियों, आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद। आप सभी ने मुझे जो प्यार और सम्मान दिया उसका मैं आजीवन ऋणी रहूंगा। एक खुला खत होने के नाते मैं आपमें से किसी का भी नाम लिख पाने में खुद को असमर्थ और क्षमाप्रार्थी मानता हूं। आप सभी का स्थान मेरे जीवन में बहुत ऊंचा है और आप सभी मेरे लिए एक अनमोल निधि है। मेरी आप सबसे करबद्ध विनती है कि अपना स्नेह और दुलार ऐसे ही बनाए रखिए और हमेशा अपने इस छोटे भाई से जुड़े रहिए। साथ रहने के क्रम में अगर मेरी किसी भी बात से आपमें से किसी को भी कोई कष्ट हुआ हो तो उसके लिए मैं हृदय से क्षमा याचना करता हूं।

कुछ पंक्तियां उन लोगों के लिए भी, जो मुझे कभी अपना न समझ सके और किंचित कारणों से मुझसे खफा ही रहे। आप सभी से मेरा कभी भी कोई निजी द्वेष नहीं रहा लेकिन गलत का विरोध तो होना ही चाहिए। आपकी विविध प्रवृत्तियों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और इसलिए आपका भी एक गुरु के रूप में सादर अभिनन्दन है। आपसे क्षमा तो मैं बिल्कुल नहीं मांगूंगा क्योंकि क्षमा तब मांगी जाती है जब हम गलत हों किन्तु इतना जरूर कहूंगा कि आज मेरे मन में आपके लिए भी कोई गलत भावना नहीं है और जीवन के किसी भी मोड़ पर आप सबका भी खुले मन से स्वागत है।

इन्हीं पंक्तियों के साथ

अलविदा मेरे प्यारे शहर और उससे भी प्यारे मेरे सुख दुःख के साथियों। सांसें रहीं तो जीवन में किसी न किसी मोड़ पर फिर से मुलाकात होगी। तब तक के लिए, सदा मुस्कराते रहें, खुश रहें और खुशियां फैलाते रहें। एक दूसरे के साथ प्यार और सच्चे दिल से जुड़े रहें।

सादर प्रणाम और धन्यवाद। फिर मिलेंगे।

आपका प्यारा साथी

अरुण

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