विचार श्रृंखला – 24

जल दिवस – जीवन का संरक्षण

परसों विश्व जल दिवस था लेकिन मैंने कोई पोस्ट नहीं लिखा। जल दिवस के अवसर पर मैं थोड़ा कंफ्यूज था कि किस जल के संरक्षण की बात करूं? एक जल तो वो है जो प्रकृति में जीवन की परिकल्पना के लिए आवश्यक है तो दूसरी तरफ एक और भी जल है जो सामाजिक सद्भाव की आधारशिला है और आंखों में स्थान प्राप्त करता है। दुर्भाग्यवश पहला जल लगातार दूषित होता जा रहा है और दूसरा जल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में व्यस्त है। कहते हैं न कि जिसकी आंखों का पानी मर गया उसके जीवन में फिर बचा ही क्या?

बात जब जल संरक्षण की चली है तो समय के बाद जल ही है जिसे हम सबसे ज्यादा बर्बाद करते हैं। जल एक ऐसी नियामत है जो हमें सबसे ज्यादा आकर्षित भी करती है और यह आकर्षण ही उसकी बर्बादी का सबसे बड़ा कारण भी है। दस साल पहले जिस कुएं का पानी जीवन का आधार होता था, वही कुआं आज इस कदर उपेक्षित है कि कोई उसकी तरफ देखता भी नहीं। मानव जीवन की लापरवाह जीवन शैली ने जल स्रोतों को उस कदर बर्बाद किया है कि जल स्रोतों में जल से ज्यादा कूड़े और प्लास्टिक का ढेर रह गया है। ये कूड़ा न सिर्फ उन जल के स्रोतों को खराब कर रहा है बल्कि भूमिगत जल की गुणवत्ता पर भी व्यापक दुष्प्रभाव का कारक है। यही हालत नदियों एवं तालाबों की भी है जिससे जल और उस जल स्रोत से जुड़ी जैव विविधता भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई है।

दूसरी तरफ आंखों में बसने वाला जल इतना दुर्लभ हो गया है कि अब वो किसी के दुख पर द्रवित नहीं होता। यहां तक कि कई बार वो किसी अपने के लिए भी बहने से इंकार कर देता है। और धृष्ट तो इतना है कि खुद को भी धोखा देने से पीछे नहीं हटता। किसी की मौत पर भी अब वो बाहर नहीं आता और कई बार तो निर्लज्ज हंसी और कटाक्ष का भी रूप धर लेता है।

चारों तरफ जल के श्रोत होने के बावजूद खरीद कर पानी पीने को मजबूर मानव इतना बेबस हो चुका है कि वो संवेदनाओं के प्रतीक अपने आंखों का जल भी नहीं संभाल पाया है। हद तो तब हो जाती है जब मानवता और देश की सुरक्षा में लगे वीर सैनिकों के पराक्रम और शहादत तक का सबूत मांगने की कोशिश की जाती है। अब मानव, जल और मन इतना अधिक दूषित कर चुका है कि वह चाहकर भी कुछ कर पाने में असमर्थ है। ऐसा इसलिए नहीं कि अब कुछ किया ही नहीं जा सकता बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव अब भी अपनी हरकतें और विचारधारा को सुधारने को तैयार नहीं है।

तो अब क्या ? अरे भाई, उठो, जागो और खुद को सुधारो ताकि आने वाली पीढ़ियां पानी को फोटो में नहीं बल्कि वास्तव में प्रयोग करने योग्य स्वरूप में प्राप्त कर सकें। साथ ही ये भी मत भूलें कि जब कोई विपत्ति आती है न तो हर जमी बर्फ को पिघला देती है और ऐसे समय में जब आसपास कोई न दिखे तो कठोर से कठोर पत्थरदिल को भी अंदर तक हिला कर रख देती है। इसलिए सहजीविता और सहभागिता बनाए रखें और जीवन को एक नए नजरिए से देखने की शुरुवात करें।

Save water, save nature, save life, save humanity

धन्यवाद।

Picture credit – Google

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