काव्य श्रृंखला – 21

घर खो गया है

जीवन की आपाधापी में, ख्वाहिश के तंग गलीचों में,
सब कुछ पाने के सपनों में, ईमान कहीं सो गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

लड़का लड़की के अंतर में, रूखे रिश्तों की ठंडक में,
अपनों की सूखी आंखो में, जज़्बात कहीं जम गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

बैंकों में शून्य बढ़ाने में, घर की हर तह चमकाने में,
हर पल उठती दीवारों में, जीवन कहीं दब गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

बचपन में बैग उठाने में, पढ़ कर रोजगार जुटाने में,
घिसते जूते, झुकते कंधे, इंसान मशीन बन गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

दुख की हर आंच उठाने में, सुख से जलते इंसानों में,
कुछ प्यार के लम्हें जुटाने में, सद्भाव कहीं थम गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

ऑफिस में उम्र खपाने में, दूजों से टांग छिपाने में,
त्योहारों पर भी कमाने में, खुशियों का पल गुजर गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

तेरे मेरे के चक्कर में, अपनी डफ़ली ही बजाने में,
नफ़रत के बढ़ते धारों में, आपसी प्यार ही टूट गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

ईगो अपना चमकाने में, अपनों के भाव भुलाने में,
हर पल घुटती उम्मीदों में, अपनापन ही रो रहा है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

भाई भाई की लड़ाई में, संतानों की रुसवाई में,
हर दिन बढ़ती बेवफाई में, कंक्रीट का ढांचा ही रह गया है
सच ही कहते हैं दुनिया वाले, कि घर कहीं खो गया है

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