काव्य श्रृंखला – 19

यह कैसी भक्ति

एक रोज मिला कोई मुझको मेरे गांव के बाहर सड़कों पर
अरदास मिली कि मदद कर दो मां पूजन के पंडालों पर

एक भव्य आयोजन करने की थी बात कही आयोजक ने
मैंने भी सहर्ष स्वीकार किया प्रस्ताव किया था जो उसने

मां की पूजा भक्ति के निमित्त गया मैं नियत दिन व समय
था भव्य बड़ा पंडाल सजा और भीड़ बड़ी थी भक्तिमय

तत्क्षण मेरे कानों में पड़ा एक कर्णवेध संगीत का स्वर
बस उसी समय मजबूर हुआ लिखने को मैं ये काव्य के स्वर

थी भजन गीत की जो उम्मीद वो तोड़ा गंदे गानों ने
बज रहे थे लाउडस्पीकर पर मां के पावन पंडालों में

थोड़ा ही आगे बढ़ा नजर आए आयोजक ठेके पर
हाथों में थैली मदिरा की और पांव बढ़े थे बुचरी पर

मैं समझ सका न ये लीला जो रची गई थी धोखे से
कैसी भक्ति का रूप था ये जो पेश किया था उन सबने

मन व्यथित हुआ सब सुन गुन कर पर जनमानस को फर्क कहां
मिले लोग मुझे कोसें सबको पर विरोध का स्वर था जाने कहां

आयोजक गण को सुनाया जो मैंने थोड़ी सी खरी खोटी
पाया प्रत्युत्तर और धमकी कि काम करो खाओ रोटी

इतनी मेहनत जो करी सबने तो थोड़ी मौज मनाएंगे
है हिम्मत जो कोई रोके हम वही करेंगे जो चाहेंगे

नहीं साथ मिला किसी का मुझको चुपचाप निकल कर आया था
मानस के पटल से उस भक्ति का रूप न जाने पाया था

सच ही तो कहा था ग्रंथों ने ढूंढो ईश्वर अपने मन में
भक्ति का भाव और पूजा पाठ सब दर्शाओ अपने घर में

पर आज यही कहना मुझको मैं आयोजन का विरोधी नहीं
पर आयोजन के नाम पर ऐसी हरकत में सहभागी नहीं

अपनी मां के सम्मुख जो थे विरुद्ध उन भोंडे गानों के
कैसे कर बैठे वही कुकर्म वो जगजननी के प्रांगण में

गर आयोजन है भक्ति का तो भक्तिमय ही रहे तो सही
वरना पूजन को अपना घर, आंगन, मंदिर हैं सबसे सही

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