काव्य श्रृंखला – 18

प्रोपोज डे और कल्लू का दर्द

चहुं ओर लालिमा सूरज की, भई भोर और मैं हुआ विभोर
होके निवृत्त नित कामों से, मैं निकल पड़ा ऑफिस की ओर

कुछ दूर ही पहुंचा था जब तक, मिल गया मुझे कल्लू तब तक
बालों में तेल चमेली का, और डिओड्रेंट की बू से भरा

पूछा मैंने कि हे प्रिय कल्लू, क्या बात है क्यों है चकोर बना
बिन पंख और बिन तान के भी, उड़ता गाता है किधर चला

उसने गर्दन अपनी झटकी, और ताव खा गया वो घनघोर
बोला चाचा, क्यों टोक दिया, मैं जाता टुन्नी के घर ओर

तुम ओल्ड एज और बिन फैशन, क्या जानो प्यार की बातों को
कल रोज दिया था टुन्नी को, है प्रोपोज आज करना उसको

मिलने आएगी चवन्नी के, ट्यूबवेल वाले पतलो के पास
मत बन जाना तुम मुनि नारद, चुपचाप पकड़ लो अपनी राह

मिंटू और गुलाबो भी होंगे, और होगी गुलाबों की खुशबू
तुम नीरस मानुष नाम कलंक, तुम क्या जानो क्या है महबूब

मैं हूं साधक भालेंटाइन का, पूरा सप्ताह हमारा है
तुम देखो श्वेत हिमालय को, ये प्रेम प्रहर बड़ा प्यारा है

मैं खुजलाते अपना माथा, चल पड़ा था अपने कर्म क्षेत्र
था माह वसंत मधुर वत्सल, मेरा साथी मेरा काव्य प्रेम

व्हाट्सएप फेसबुक सोशल मीडिया, पर आज मची थी धूम बड़ी
फिर याद मुझे कल्लू आया, फिर जुड़ने लगी थी कड़ी से कड़ी

जब शाम को घर वापस आया, तो मिला कल्लू फिर से एक बार
चेहरा सूजा, फूटा माथा, दो दांत हाथ में, लंगड़ी चाल

मैंने पूछा कि सुनाओ वत्स, क्यों अष्टावक्र बने फिरते
क्या टुन्नी ने इंकार किया, या खाई मार उसके घर से

कल्लू की आंखों से फूटी, गंगा जमुना की विरल धारा
बोला चाचा क्या कहें तुमसे, मिंटू ने मुझे है बहुत मारा

देना था गुलाब जो टुन्नी को, वो चला गया था गुलाबो को
नाराज हुई ना अाई थी वो, पर पता चल गया मिंटू को

गुस्से में लाल हुआ कमबख्त, और बोल दिया फिर चिंटू को
चिंटू जो गुलाबो का भाई, ले आया रिंटु किंटू को

फिर हुआ वही जिसका डर था, मारा सबने पतलो में पटक
कह दिया किरासन भैया से, उसने भी उतारा भूत झटक

भालेंटाइन बाबा ने न साथ दिया, न प्यार मिला, बस मार पड़ी
इससे अच्छे बजरंग बली, ना भूत धरे, ना चोट पड़ी

अब बात आपकी मानेंगे, पहले जीवन को सुधारेंगे
गर कभी किया प्रोपोज कहीं, पतलो के पास न जाएंगे

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