विचार श्रृंखला – 17

औलाद वालों फूलो फलो

इन दिनों प्रयागराज में कुंभ मेले की भव्य छटा श्रद्धालुओं को अत्यंत मनोरम और दिव्यता का अनुभव प्रदान कर रही है। यह सत्य है कि इस बार का आयोजन अपने आप में अत्यंत विशिष्ट और भव्य है। विगत 3 फरवरी को जब मैं कुंभ मेले में दर्शन स्नान के पश्चात वापस अपने गन्तव्य की तरफ बढ़ रहा था तो संगम और कुंभ की दिव्य छटा के वशीभूत मन में एक विशेष प्रकार की शांति और उत्साह का समावेश था। चूंकि अगले दिन ही मौनी अमावस्या का दिव्य स्नान होने वाला था अतः हम लोग पैदल ही यात्रा कर रहे थे।

कुछ दूर आगे बढ़ने पर अन्य अनेक प्रकार की ध्वनियों के बीच एक गीत का स्वर सुनाई पड़ा– भूखे गरीब की ये ही दुआ है, औलाद वालों फूलो फलो। 

और अचानक ही सामने एक दृश्य उभरा और मन व्यथित हो उठा। एक अत्यंत छोटी बच्ची बांस के दो सहारों के बीच बंधी एक रस्सी पर हाथों में एक अन्य बांस पकड़े हुए संतुलन साधे कदम ताल कर रही थी। उसके सामने एक महिला खड़ी थी जो संभवतः उसकी माँ थी। थोड़ी दूर पर एक थाली रखी हुई थी जिसमें चंद सिक्के और कुछ दस और बीस के नोट पड़े हुए थे। कुछ लोग उस दृश्य की तस्वीर उतारने में लगे थे तो कुछ लोग दया भाव लिए उस थाली में चंद सिक्के गिराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर चुके थे। अचानक मुझे याद आया कि इस बच्ची को मैं लगभग इसी रुप में एक बार सिविल लाइंस प्रयागराज में भी देख चुका था। अतः ये तो स्पष्ट था कि उसका यही काम उसके परिवार की आजीविका का साधन था। अर्थात् जिस उम्र में बच्चे खिलौने की जिद करते हैं उस उम्र में वह बच्ची खुद खिलौना बनी हुई थी और अपने परिवार के दो वक्त की रोटी जुटाने में लगी थी। जो उम्र बच्चों के विद्‍यारंभ की होती है उस उम्र में वह बांस के एक टुकड़े के सहारे अपने जीवन में संतुलन साधने का प्रयास कर रही थी। हमेशा की तरह हमारा समाज संवेदनाशून्य भाव से या तो फोटोग्राफी में व्यस्त था या फिर ऐसे किसी विषय पर सोचने के लिए उनके पास समय का अत्यंत अभाव था। सरकारें भी अक्सर ऐसे वर्गों के प्रति उदासीन ही रही हैं। यद्‍यपि इस बार के अंतरिम बजट में ऐसे हाशिए पर जा चुके लोगों के उत्थान के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं लेकिन वो कितने कारगर साबित होंगे ये तो समय ही बता पाएगा।

ये तो बस एक उदाहरण था। ऐसे ही पता नहीं कितने बच्चे संसाधनों के अभाव में समय से पहले ही वयस्क हो जाते हैं। उनका दोष सिर्फ इतना होता है कि वे एक ऐसे परिवार में जन्म लेते हैं जो या तो पहले से संसाधनहीन है या काल के कुचक्र में फंसकर अपने बचे खुचे संसाधनों से भी हाथ धो बैठा है। भारत का बाल श्रम कानून 14 साल से कम आयु के बच्चों से किसी भी प्रकार का श्रम कराने से निषेध करता है। शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार बन चुका है और प्राथमिक शिक्षा समाज के प्रत्येक वर्ग को फ्री में उपलब्ध है। लेकिन इन बच्चों का क्या करें साहब? पेट की आग दुनिया की किसी भी इच्छा और जरुरत से बलवती जो ठहरी। उन्हें इन अधिकारों का न तो ज्ञान है और न ही वे इस स्थिति में हैं कि इन अधिकारों से कुछ लाभ अर्जित कर सकें। अगर वे काम न करें तो उन्हें भोजन तक नसीब न हो। इन सबके बीच उन खुद्दारों के व्यक्तित्व का एक शानदार पहलू यह भी है कि उन्होंने काम करना पसंद किया लेकिन किसी के पास भीख मांगने तो नहीं गए। मैंने उन माँ बेटी को कभी भी किसी से कुछ याचना करते नहीं देखा। वे अपने काम में मशगूल हैं, तमाशबीनों के करम से अगर कुछ मिल गया तो दो वक्त की रोटी मिल जाएगी वरना मां के आंचल में पेट की आग दबाए सो जाने के अलावा वो और कुछ नहीं कर सकते।

खैर जब तक जनता और सरकार की नींद नहीं खुलती तब तक ऐसी अनेक पीढ़ियाँ आती और जाती रहेंगी। इन सब विचारों को आपके समक्ष रखने के बावजूद मैं खुद को उसी भीड़ का हिस्सा पाता हूं जो चिंता तो व्यक्त करती है या कुछेक रुपए दान कर यह मान लेती है कि वे उसके आगे उन बच्चों के लिए कुछ नहीं कर सकते। जब तक वास्तविक रुप से अन्त्योदय नहीं होगा, ऐसे अनेक बच्चे अपना बचपन और अपना जीवन गंवाते रहेंगे और वो गाना ऐसे ही अनवरत बजता रहेगा–

भूखे गरीब की ये ही दुआ है, औलाद वालों फूलो फलो।

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