काव्य श्रृंखला – 17

शहादत के बाद

देश की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर की शहादत न केवल देश और समाज की क्षति है बल्कि वो एक ऐसे परिवार की भी क्षति है जिनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत वो वीर सैनिक ही था। बड़े ही दुःख की बात है कि शहादत के समय कुछ पल का शोक और बड़ी बड़ी घोषणाएं कर जनता और जनप्रतिनिधि दोनों ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। उस परिवार की सुध लेने फिर कोई भी नहीं आता। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए हैं जहां उस परिवार को घोषित सहायता राशि भी नसीब नहीं हुई और कुछ मामलों में जनता ने भी उनके दुखों को बढ़ाने का काम किया। वैसे तो हालात बहुत सुधर गए हैं लेकिन कुछ दिन पहले सोशल मीडिया में फैले अमर शहीद गुरसेवक सिंह के पिताजी के बयान से मन व्यथित हो उठा। प्रस्तुत है इसी मुद्दे पर आधारित काव्य श्रृंखला का आज का अंक। कृपया अवश्य पढ़ें और पसंद आए तो अन्य लोगों तक भी पहुंचाएं।

तिरंगे के रंग का कफ़न तुमने देखा
जवानी में छलनी बदन तुमने देखा
शहादत पर आंखों से आंसू भी निकले
वतन के सिपाही का दम तुमने देखा
करके गया फर्ज़ अपना वो पूरा
न आने दिया दाग वर्दी पर अपने
तुम्हें नींद आई जब अपने घरों में
वो लड़ता रहा दुश्मनों से समर में
न सोचा कभी भी कि उनका क्या होगा
जो अपने थे उसके अपने ही घर में
वो मईया वो बप्पा वो बीवी वो अप्पा
वो बेटा वो बेटी वो बहना वो भैया
था आंखों का तारा वो अपने जनों का
मगर सबसे पहले वो था इस वतन का
चला वो गया सींच खून से ये मिट्टी
न आने दिया आंच बनकर खुद मिट्टी

चलो बात कर लें कि उनका क्या होगा
जो जिंदा थे अब तक उसी के सहारे
क्यों भटकें वो अक्सर ही दफ्तर से दफ्तर
क्यों लाले पड़े उनको भोजन को अक्सर
हुआ जब फना वो बहुत लोग आए
दिलासो की पुड़िया थे सबने थमाए
हुई थी जो घोषित मदद हाकिमों की
न फोटो भी अब तक थे उनके दिखाए
मैंने देखा है एक बाप को संग बहू के
उम्मीदों के दामन पर जीवन उठाए
दी दस्तक उन्होंने बहुत से दरों पर
बढ़े बस दिलासे ही उनके सरों पर
थका बाप रोता है भीतर ही भीतर
लिए मांग सूनी कहीं रोती पत्नी
अंधेरे में खोती कहीं मां की ममता
कहीं रोते बच्चे एक कोने में सोकर

मगर फिर दिखी ना वो रोती हुई जनता
जो आई थी अर्थी को कंधा लगाने
लगा कर के मूर्ति शहीदे वतन की
वो नेतागणों ने भी झोले उठाए
मिली न मदद जो थी घोषित उसी दिन
न सुध है किसी को कि उनको दिलाए
उन्हें ना पता कि वो जाएं कहां पर
वो कैसे दुखों का हर मंजर उठाएं
है अपना धरम भी शहादत के पथ पर
चलो हम उन्हें थोड़ा जीवन दिखाएं
हुई जो शहादत कहीं पास अपने
चलो हम उन्हें थोड़ा अपना बनाएं
मिले उनसे जब भी करें कद्र उनकी
करें कुछ मदद जो भी हो अपने बस में
करें ना अगर कुछ भी उनके लिए तो
ना अपने करम से घर उनका जलाएं

चलो हम उन्हें थोड़ा जीवन दिखाएं
चलो हम उन्हें थोड़ा अपना बनाएं

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