काव्य श्रृंखला – 16

वफा की एक अदा

अनेकों बार हमारे जीवन में ऐसे मौके आते हैं जब हम किसी व्यक्ति को दिल से चाहते या इज्जत करते हैं लेकिन उस व्यक्ति को हमारी भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं होती। यदि वो व्यक्ति कोई अपना हो तो मन का संताप दोगुना हो जाता है। Elasticity का सिद्धांत कुछ अर्थों में इन मामलों में भी लागू होता है और किसी न किसी दिन ये फैसला करना ही पड़ता है कि “move on buddy”. प्रस्तुत है इसी विषय पर आधारित आज की कविता।

हम बुलाते रहे, वो न आए कभी
हम हमेशा ही, खुद को बहलाते रहे
उनको फुरसत न थी, याद करने की भी
जिनकी चाहत में दिल हम, जलाते रहे

गर कभी मिल गए, तो लगा एक पल
कि वो मेरे ही थे, और हमेशा रहे
पर समझ में न आई, कभी वो बेरुखी
जो वो दूरी से हम पर, बरसाते रहे

थी जो उनकी वफा, क्या हमारे लिए
हम हमेशा से ही, बाखबर ही रहे
पर उन्हें ये लगा, कि ये उनकी अदा
से सदा हम यूं ही, बेखबर ही रहे

कैसी फितरत थी ये, उस हसीन नज़्म की
जिसको गाने को, भौरे तरसते रहे
थे वो कातिल, ये सबको खबर भी रही
फिर भी जानिब को, उनके भटकते रहे

आज हमने भी ठानी, न जाएंगे अब
उनकी जानिब, गली, बागवान की तरफ
वो जहां भी रहें, बख्सें चाहत जिसे
वो तराने में उनके, सदा गुम रहे

चाहतों की कहानी, सदा ही रहे
वो भी चाहें उन्हें, वो जो पाएं जिन्हें
हम दरखतो के पंछी, हमारा जहां
इस जहां में सदा, यूं ही कायम रहे

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