काव्य श्रृंखला – 15

रोते हो क्या

उसने पूछा, रोते हो क्या
मैं बोल दिया, हां कभी कभी
उसने समझा मैं बुजदिल हूं
कायर, डरपोक, नादान सभी

क्या समझाऊं, क्या बताऊं उसे
क्या समझेगा वो रीत मेरी
क्यों रोता हूं, कब रोता हूं
क्या समझेगा वो प्रीत मेरी

हां, रोता हूं मैं अक्सर ही
जब चोट जिगर पर खाता हूं
भावुक हूं थोड़ा सरल हृदय
गलती अक्सर कर जाता हूं

रोता हूं, जब गलती से भी
कर देता हूं किसी को भी दुःखी
रोता हूं, जब कोई अपना
समझे ना मुझे, ना समझाए

रोता हूं, देख उस गिरगिट को
इंसानी खाल में जो है छुपा
रोता हूं, देख उस अबला को
कोई विकल्प हो जिसके पास नहीं

हां, रोता हूं अक्सर ही मैं
भावुक भी हूं और कातिल भी
करता हूं कत्ल खुद ही खुद का
रोता हूं, जब बिक जाता हूं

कोई रिश्तों से, कोई बातों से
कोई पैसों से, कोई वादों से
बिकता है हर प्राणी जग में
मैं तो फिर भी एक पागल हूं

कुछ सोचा जब अपनी खातिर
ढूंढा जब कोई खुशी अक्सर
वो अक्सर आकर लूट गए
मेरी खुशियां, सपनों का घर

फिर भी अक्सर मैं लगातार
एक बार खड़ा हो जाता हूं
हूं मनुज, मूर्ति एक मिट्टी की
एक बार पुनः जुट जाता हूं

गर टूट कभी जीवन से ही
जीवन को जीने लगता हूं
गर छोड़ हौसला जीने का
समझौतावादी बनता हूं

अगले पल साहस की एक किरण
फिर मुझे सहारा देती है
एक बार पुनः लड़ जाने का
फिर मुझे हौसला देती है

फिर रोता हूं, फिर गाता हूं
फिर सोता हूं, फिर हंसता हूं
फिर जगता हूं, फिर लड़ता हूं
गिरता हूं पुनः, फिर उठता हूं

कह लो तुम कायर बार बार
कह लो तुम पागल हे प्रताप
अब समय है फिर से उठने का
अब समय है फिर से रोने का

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