विचार श्रृंखला – 14

सरकारी संपत्ति – आखिर किसकी ? (भाग – 1)

“आज भारत बंद है। सरकार की विभिन्न नीतियों के विरोध में कखग संस्था ⁄ पार्टी द्वारा भारत बंद का आयोजन किया गया। विभिन्न स्थलों पर विरोध स्वरुप हुई तोड़फोड़ में सरकारी संपत्ति को हुई क्षति का आकलन लगभग 500 करोड़ रुपयों का है।”

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पहचाना। ये वही पंक्तियाँ हैं जो अक्सर खबरिया जगत की सुर्खियों में ब्रेकिंग न्यूज के रुप में देखने, पढ़ने और सुनने को मिल जाती हैं। इस प्रकार के आयोजनों के प्रायोजकों का निहितार्थ चाहे जो भी हो लेकिन विरोध के नाम पर की जाने वाली तोड़फोड़ कहीं से भी उचित नहीं कही जा सकती है। तर्क दिया जा सकता है कि भारतीय संविधान अपने अधिकारों की रक्षा के लिए विरोध प्रदर्शन की अनुमति देता है लेकिन वह अनुमति शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए ज्यादा प्रासंगिक है।

सरकारी संपत्ति के नाम पर तोड़ी गई हर चीज को वापस जुटाने के लिए सरकार को नए सिरे से संसाधनों की आवश्यकता होती है। अब सवाल यह उठता है कि उन संसाधनों को जुटाने की प्रक्रिया क्या है तथा उस प्रक्रिया के अनुपालन के लिए आवश्यक धन का श्रोत क्या हैॽ प्रक्रिया की कहानी तो सबको पता है। सरकारी संपत्ति हो या धन, उसे अपना न समझने वालों की संख्या हमेशा से बहुतायत में रही है। इस बात पर कभी और चर्चा करेंगे। पहले धन के श्रोत और उसके फाइनेंसर के बारे में जान लेते हैं।

सीधी सी बात है कि सरकार के पास धन कमाने के अपने कोई संसाधन नहीं है। वह अपने कार्यकलापों के लिए या तो विभिन्न करों से प्राप्त आय पर निर्भर करती है या फिर किसी कर्ज के रुप में प्राप्त अनुदान पर। मजे की बात तो यह है कि इस अनुदान की पूर्ति के लिए भी सरकार अंतिम रुप से कर से प्राप्त आय पर ही निर्भर है। अतः प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से आम जनता ही इन समस्त क्रियाकलापों के लिए अंतिम रुप से उत्तरदायी है। वही इन समस्त आवश्यकताओं को फाइनेंस करती है और इसलिए सरकार द्वारा जुटाए गए किसी भी संसाधन के असली मालिक और उपभोगकर्ता आम जनता ही है।

हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि हमारे द्वारा खरीदी गई किसी भी वस्तु के मूल्य में करों की एक निश्चित मात्रा सम्‍मिलित होती है और यह कराधान इतना निष्ठुर है कि वह इस मामले में अमीर और गरीब का भी भेद नहीं करता। अतः सरकार द्वारा जुटाए गए किसी भी संसाधन पर दोनों पक्षों का समान अधिकार माना जाता है।

अब बात करते हैं अपने असली मुद्दे की। तो साहब, जब कर मैं (जनता) दे रहा हूँ तो मेरे कर से खरीदी या जुटाई गई संपत्ति आखिर सरकार की कैसे हो गईॽ वह संपत्ति तो मेरी और मेरे जैसे करोड़ों करदाताओं की ही हुई नॽ जब संपत्ति मेरी (जनता की) है तो उसका नुकसान मेरे द्वारा नियुक्त केयर टेकर (सरकार) का कैसे हो गयाॽ उसका भला बुरा या पुनः जुटाने का प्रक्रम भी तो मेरा ही हुआ न। एक दूसरा पक्ष यह भी है कि उस संसाधन को जुटाने में सामूहिक रुप से करोड़ों फाइनेंसरों का धन लगा है, अतः उसे तोड़ने का हक भी किसी को नहीं है।

अच्छा मान लीजिए कि किसी उद्दंड बालक ने अगर अपने घर की 100 रुपए की कोई चीज तोड़ दी तो क्या वह वस्तु फिर से उसी मूल्य में प्राप्त की जा सकती हैॽ मुझे पता है कि अधिकतर मामलों में ऐसा कभी भी नहीं होगा। वह वस्तु मुझे पहले के क्रय मूल्य से अधिक मूल्य पर ही प्राप्त होगी। मान लीजिए कि दूसरी बार वह वस्तु मुझे 110 रुपए में मिली। यहाँ मूल अंतर भले ही 10 रुपए का दिख रहा है किंतु वास्तव में वह एक वस्तु मुझे अंतिम रुप से 210 रुपए में प्राप्त हुई अर्थात सिर्फ एक गलती के कारण मैंने 100 रुपए की वस्तु के लिए 210 रुपए खर्च किए। ठीक यही नियम सरकारी संपत्ति को पहुँचाए गए नुकसान के मामले में भी लागू होता है।

अधिक तोड़फोड़ = अत्यधिक कर = सुरसा के मुँह सी बढ़ती महंगाई = आम जनता के जीवन स्तर में आत्यंतिक गिरावट।

अब हम (जनमानस) तो ठहरे करों के आरोपण के सबसे बड़े विरोधी। हम क्यों बिना मतलब का कर देने लगे भला। हम तो वही कर देना पसंद करेंगे जिससे हमारे मतलब का कोई संसाधन या सुविधा हमें दी जाए। नहीं तो भैया हम ना करने वाले किसी उल्टी सीधी योजना को फाइनेंस।

उपरोक्त लेख का एक ही उद्देश्य है कि हम सब इस तथ्य के प्रति भी जागरुक हों कि सरकारी संपत्ति वस्तुतः हमारे ही पैसे से खरीदी या बनाई जाती है और इसलिए उसका सावधानीपूर्वक दोहन और समुचित देखरेख की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। और हम इतने मूर्ख तो कतई नहीं हैं कि अपनी ही चीज को तोड कर अपना ही खर्च बढ़ाते चलें।

क्रमशः……..

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