काव्य श्रृंखला – 11

मेरी लेखन यात्रा

एक बात कभी पूछी उसने कि कौन प्रेरणा देता है
है प्रेरणा कोई सखी तेरी या राज है कोई छुपा हुआ
आखिर तू कैसे लिखता है, कविता उपजी कैसे अन्दर
गर काव्य वियोग का है संगम, तो किसकी विरह में तू लिखता है

क्या कहूं, उसे क्या समझाऊं, है विरही मन, जन्मा जब से
जब भी फैलाया पंख कभी, चाहा उड़ना अनंत की ओर
हर कदम पे थी कोई बाधा, जिसने मेरे पर कतर दिए
फिर भी मेरे लेखक मन ने, रखा जारी जिंदा खुद को

शुरुआत हुई बचपन में जब, चित्रों में बसता था मेरा मन
हो कागज या दीवार कोई, हो कलम हाथ या चाक कोई
बनते रहते थे अनेकों चित्र, सजते रहते थे कथाओं से
पापा अक्सर करते बखान, पर छूटा वो सपना नादान
कारण मैं नहीं बताऊंगा, जो छूटा उसका क्या गुणगान

फिर चली लेखनी गद्य की ओर, पहली एकांकी लिखा था जब
पढ़ता मैं कक्षा नौ में था, विषय ज्वलंत दहेज ही था
वो रचना भी उपलब्ध नहीं, खा गए उसे चूहे झींगुर
लग गया पढ़ाई करने में और लेखन फिर से छूट चला

फिर से लिखना जब शुरू किया, इस बार निबंध थी मेरी विधा
चलती थी कलम उन विषयों पर, थे सामाजिक सामरिक यथा
जीता था प्रतियोगिता कई, चल पड़ा था एक क्रम इसका भी
पर छूटा ये लेखन भी तब, जब छोड़ा पिताजी ने ये जग

गम था हरदम एक सोच भी थी, दाता ने दिया नहीं गान कला
लेकिन थी एक सुनहरी विधा, कविता ने आकर्षित सदा किया
सोचा करता था कि क्या मैं लिख सकता कभी कोई कविता
फिर मन के बोल हमेशा ही निकले, पर गद्य थी उनकी विधा

नहीं पता कि कैसे शुरू हुआ, नहीं पता कौन था उत्प्रेरक
ये तुम जानो और पहचानो, मैंने वो लिखा जो मन ने गुना
बस निकल पड़ी थी वो कविता, मेरे मन मंदिर में अंदर
जो लिखा था मैंने यात्रा में, नहीं पता कहां से मिले थे शब्द

लिखता हूं जीवन की आशा, मानव मन की कोमल भाषा
लिखता हूं भाव की परिभाषा, जीवन की कटु या मधुर गाथा
नहीं आवश्यक कि विरह ही हो उत्प्रेरक, लेखन का कारण
जीवन, समाज और ग्राम में है निहित अनंत विषयों का दल

मैं लिखता हूं, बस लिखता हूं, बिन स्वार्थ या किसी इच्छावश
हैं ये प्रतिबिंब मानव मन के, वही लिखता हूं, जो गुनता हूं
नहीं लिखता मैं खुद के ऊपर, नहीं विषय वो विश्व प्रदर्शन का
लिखता हूं बस उन विषयों पर, हैं विषय जो हम सबके मन का

कुछ विषय भी हैं उनमें शामिल, जिन पर लिखना है सोच मेरी
चाहूं लिखना उन विषयों पर, जुड़ पाएं जो जनमानस से
गर मिला समय जीवन में अब, गर मिले नहीं कोई बाधा
फिर लिखना है और लिखना है, बस ध्यान धरें मोहन राधा

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