विचार श्रृंखला – 10

जीवन चलने का नाम

अक्सर देखा गया है कि हममें से अधिकांश लोग किसी भी कठिनाई की कल्पना से ही बुरी तरह घबरा जाते हैं और हिम्मत हार कर बैठ जाते हैं ।

इस मानसिकता के पीछे अक्सर लोगों द्वारा उस तथाकथित कठिनाई के बारे में फैलाई गई कपोल कल्पनाएँ उत्तरदायी होती हैं जो अनेक अवसरों पर निर्मूल ही सिद्ध होती हैं ।

उद्यमेन हि सिद्ध्यंति कार्याणि न मनोरथै:

नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगा:

यदि शेर यह सोच ले कि वो जंगल का राजा है तो उसे शिकार करने की क्या आवश्यकता है, तो वह भोजन के बिना ही प्राण त्याग देने के लिए विवश हो जाएगा ।

ऐसे ही यदि मनुष्य अपने जीविकोपार्जन हेतु उद्यम न करे तो एक दिन भुखमरी के कगार पर अवश्य ही पहुँच जाएगा ।

यहाँ कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि किसी व्यक्ति विशेष के पास अकूत मात्रा में पैतृक संपत्ति है जो उसकी आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए भी पर्याप्त रूप से भोग्य है ।

संचित धन के कुबेरों की दुर्दशा नोटबंदी के दौर में देखी जा चुकी है।

Money is an idea that inspires confidence.

जैसे जैसे यह संचित धन खर्च होता जाता है, वैसे वैसे संबंधित व्यक्ति का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है और ऐसा व्यक्ति पहले तो कर्ज के दुश्चक्र में फँस जाता है या फिर किसी अनुचित मार्ग का अनुसरण करने लगता है।

तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर

उपरोक्त कथन के मूल में जीवन का एक गूढ़ अर्थ छिपा है। कहा गया है कि आवश्यकता तो एक भिखारी की भी पूरी हो जाती है लेकिन लिप्सा किसी राजा की भी पूरी नहीं हो सकती।

इन्हीं कथनों की पुष्टि कबीरदास जी ने निम्नलिखित शब्दों में की है:-

साँई इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय

कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में किसी भी कार्य की सिद्धि हेतु उस लक्ष्य की दिशा में सार्थक कदम बढ़ाना पहली अनिवार्य शर्त है।

चाहे वह लक्ष्य धनार्जन का हो या किसी अभिलषित कार्य की सिद्धि का। कोई भी रास्ता इतना लंबा नहीं होता कि निरंतर चलने वाले पथिक द्वारा नापा न जा सके।

इसी प्रकार कोई भी कार्य जो मनुष्य की कल्पना के दायरे में है, उसे पूरा करना मनुष्य के लिए अवश्य ही संभव है। आवश्यकता है तो उचित दिशा में किए गए एक सार्थक और निरंतर प्रयास की।

जीवन चलने का नाम

चलते रहो सुबहो शाम

कि रस्ता कट जाएगा मितरा

ये बादल छंट जाएगा मितरा

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