काव्य श्रृंखला – 10

पुरुष : संवेदना बनाम अवधारणा

बातें सिमट रही हैं, रिश्ते सिमट रहे हैं
बातें विकास की हैं, पर दिल सिमट रहे हैं
भाई न भाई का है, ना है कोई समर्पण
सबको पड़ी है अपनी, हो एक वजूद खुद का
पत्नी कहे पति से, मुझको नहीं समझते
बच्चे कहें पिता से, देते समय नहीं हैं
माता कहे कि बेटा, पत्नी का हो गया है
कहती बहन कि भाई, अपनी ही सुन रहा है

भाई कहे कि बहना, मेरी भी कुछ हैं बातें
समझे अगर जो कोई, वो सिर्फ एक तुम हो
तुम ही अगर अड़ी तो, किसके सहारे जाऊं
बचपन की साथी तुम हो, दूजा कहां से लाऊं
बोले पति प्रिया से, समझो मेरी कहानी
कोशिश हूं मैं ये करता, दे दूं खुशी जहां की
आता हूं थक के घर पर, उम्मीद बस है इतनी
मुस्कान तुम बिखेरो, पल चार साथ जी लो

बच्चों की भावनाएं, समझो मासूमियत से
उनको नहीं पता कि, ऑफिस में क्या हुआ है
नहीं ज्ञान रहता उनको, पिता की भावना का
नहीं भान रहता उनको, परिवार वेदना का
लेकिन उन्हें समझना, समझाना है जरूरी
देना समय है उनको, कर्तव्य एक पिता का

कहता पिता है उनसे, जो आंख के हैं तारे
करता हूं मेहनत मैं, भविष्य को तुम्हारे
मुस्कान ये तुम्हारी, पीड़ा समस्त हरती
आओ करें हम बातें, एक साथ बैठ कर के
मत सोच कि है अंतर, मेरी तेरी पीढ़ी का
पलता है एक बच्चा, मेरे भी मन के अंदर

हे पूज्य मेरी माता, हूं आपका ही बेटा
मत सोच कि हुआ मैं, तुझसे कभी पराया
स्थान तेरा आता, भगवान से भी पहले
फिर कैसे मान बैठी, मुझे कोई तुझसे हर ले
आशीष तेरी मैया, जीवन की मेरी पूंजी
इससे ही तो है मिलती, संजीवनी जीवन की

तकदीर है ये कैसी, प्राणी है जग में ऐसा
करता फिकर है सबकी, लेकिन न खुद की करता
कहते उसे पुरुष हैं, पत्थर हैं सब समझते
आंसू नहीं बहाता, भीतर ही घुटता रहता
मालिक बना के उसको, परिवार की क्रिया का
करते आलोचना सब, कोई समझ न पाता
एक दिल है उसके भीतर, बिल्कुल उन सबके जैसा
हैं भावनाएं उसमें, लेकिन कहे वो किससे
है सोचता वो रहता, दे दूं खुशी मैं सबको
अपनी खुशी को अक्सर, कुर्बान कर वो जाता

बेटा कभी वो बनता, भाई है वो किसी का
वो ही तो है पति भी, बनता पिता वही है
उम्मीद है वो सबकी, सारे सितम वो सहता
बस प्यार की दो बातें, पाने को है तरसता
कोशिश कि सब सुखी हों, सब कोसते उसी को
समझ में तब है आता, जब कूच वो है करता

कहता अरुण कि समझो, उसकी भी भावनाएं
चाहे पिता हो तेरा, या हो पति किसी का
हो पुत्र एक मां का, या हो किसी का भाई
मत मार उसके भीतर की भावनाएं कोमल
दे दो समय जरा सा, दो चार प्यारी बातें
वो जान भी दे देगा, देने को सारी खुशियां

परिवार की धुरी हैं, सारे जीवंत रिश्ते
कोशिश करें कि हम सब, एक साथ बैठ जी लें
लड़ने को हैं जगत में, मुद्दे तमाम सारे
परिवार को फिर क्यों न, हम स्वर्ग ही बना लें
एक दूसरे को समझें, सुलझाएं सारी उलझन
मिल बैठकर के सारे, दुनिया नई बना लें
जिसमें न हो कलह और ना हो किसी को उलझन
हो छूट सबको इतनी कि बात सबसे कर ले
गर हो कोई भी दिक्कत समाज या स्वयं की
मिल जाए हल भी उसको परिवार के ही अंदर
फिर क्यों कोई भी भटके, जीवन में क्यों वो अटके
परिवार है सदा से समाज की पहली सीढ़ी
माहौल स्वस्थ जिसका है बहुत ही जरूरी

स्वस्थ मन का बालक, समाज स्वच्छ रखता
समाज के प्रति वो, कर्तव्य को समझता
पीढ़ी को आने वाली, संस्कार हम यही दें
शुरुआत हो फिर घर से, विकास की वतन के

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