काव्य श्रृंखला – 8

सपना या हकीकत

एक रोज चला मैं सड़कों पर
सोचा कि ले लूं स्वास्थ्य लाभ
निश्चिंत चपल उत्साह युक्त
कदमों की थी एक नियत चाल

थी सोच बने ये दिनचर्या
रहें चुस्त दुरुस्त सदा खुशहाल
चल रही थी मंथर सुखद पवन
करती संग मेरे कदमताल

फिर मोड़ अचानक आया एक
और गए बिखर इरादे नेक
कारण क्या बताऊं हंसोगे तुम
क्या व्यथा, कहां समझोगे तुम

तत्क्षण आया कपि एक समक्ष
था शायद वो सेनानायक
उसके पीछे एक फौज खड़ी
शत अर्द्ध सम संख्या थी बड़ी

उनको मैं लगा न कोई परिचित
सच ही था, ये थी, दुनिया उनकी
उनको ना ज्ञान अतीत का था
पूर्वज थे पर, थे, अब तो नहीं

बोला उनका सेनानायक
रुक नालायक, घुसता है कहां
मैं बोला, चाचा बच्चा हूं
क्या गलती मेरी, तू क्यों है अड़ा

चाचा क्या कहा वो बिफर पड़ा
बोला, छोटा है, बाप न बन
मैं बोला, चाचा, समझ सही
माना छोटा, पर, बच्चा नहीं

संसाधन जो तुम लूट रहे
घर बार जो तुम सब कूट रहे
बिन बोए फल तुम खाते हो
अपने बच्चों को डराते हो

इतना सुनना था कि शामत थी
अगला निर्देश था, आक्रमण
खी खी खो खो की ध्वनि गूंजी
तब एक कला मुझको सूझी

लपके कपि चार थे मेरी तरफ
पकड़े जकड़े फिर पता नहीं
जब नींद खुली तब पता चला
था स्वप्न मगर कुछ बता गया

क्या हम मानव हैं उनसे कम
जो मिले थे मुझे उन ख्वाबों में
हम भी तो वही करते अक्सर
घर दूजा लूट बसाते घर

नहीं होती तब कोई समझ कभी
घर टूट रहा किसी का उस वक्त
आता है होश मगर तब तक
होता है चुका गुनने का वक्त

आता है होश मगर तब तक
होता है चुका गुनने का वक्त

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