काव्य श्रृंखला – 7

अब तो जाग जाओ

घन रात अंधेरी काली सी, कोहरे की चादर ओढ़ी थी
जब निकला कर्म पथ पर मैं, हूं सिर्फ पथिक या कोई कवि
सब दुबके पड़े थे घरों में जब, हीटर ब्लोअर की गर्मी में
मैं टहल रहा था सड़कों पर, करने को कोई काव्य सृजन
उपजा सवाल एक मन में कि, क्या सबको हासिल संसाधन
आओ मिलजुलकर करें विचार, क्या संभव है एक समाधान

आगे जो बढ़ा था पथ पर मैं, सम्मुख थी एक कृषित काया
दुबका, कुचला, अधमरा मनुज, भूखा, प्यासा, निर्वस्त्र बेघर
कारण क्या उसके दुर्दिन के, क्यों था असहाय मनुज होके
उपलब्ध नहीं थे साधन क्यों, आवश्यक जीवन यापन के
था किसका उत्तरदायित्व, खुद उसका, समाज या सरकार
क्या हासिल उसको कर्म न थे, या थी एक प्रेरक की दरकार

मन में पीड़ा का भाव लिए, मैं घर वापस अपने आया
उसकी हालत जबसे देखा, अपना घर राजमहल सा लगा
अल सुबह अचानक निकल पड़ा, सरकारी दफ्तर की ओर
था लक्ष्य मिले इंफॉर्मेशन, जनहित कार्यों के पात्र थे कौन
देखी लिस्ट, हुआ विचलित, आखिर कैसी थी वो अंधेर
पात्रों की लिस्ट में पात्र न थे, वो था अपात्रों का एक ढेर

खाद्य सुरक्षा लिस्ट में थे, कोटेदार और दुकानदार
आवास योजना लिस्ट में थे, जिनके घर थे भारत में चार
मनरेगा में डॉक्टर, साहब, इंजिनियर, वकील और प्रधान
सबसे विचलित करने वाला, एक कुटुंब के चार थे नाम
रहते थे संयुक्त सभी पर, राशन सबके अलग अलग
पारिवारिक आय को कम करने की ये युक्ति थी दिखी सर्वत्र

नाम न था हरि राम जी का, जिनके पास न कोई घर
नाम न था माधव जी का, दिव्यांग, निशक्त, बिना साधन
नाम न बुधिया ताई का था, साठ की उम्र खींचे ठेला
नाम न था नारायण का, अस्सी के, बिन केयर टेकर
नाम न था उन बच्चों का, बचपन से जो घूमें अनाथ
नाम न था उस युवती का, कम उम्र में ही जो विधवा बनी

ऐसे अनंत थे उदाहरण, करने को व्यथित वो काफी थे
करने को विफल जनहित मंशा, वो चंद दुशासन काफी थे
डाका डाला जिन लोगों ने, हकदार के उन अधिकारों पर
दोषी थे वो अधिकारी भी, जिनको थी दिखी केवल रिश्वत
सत्ता के मठाधीशों की भी, गलती इसमें कुछ कम न रही
सत्ता के नियंता वोटर की, भी जिम्मेदारी बराबर थी

आखिर क्यों हमको पता नहीं, अपने हक के बारे में भी
टीवी, अखबार, इंटरनेट के, बहुआयामी दौर में भी
हम देखें पढ़ें कूड़ा कचरा, अपने हक की कोई खबर नहीं
फिर कैसे मिले हमको वो हक, जो लूट रहे कुछ कालयवन
है दौर आज ऐसा जिसमें, सब कुछ आधारित डाटा पर
आओ सीखें, डालें आदत, जानें वो, जो अपना है हक

आवाज उठे फिर जोरदार, जैसे ही दिखे कोई भ्रष्टाचार
परिवार, समाज भी ले संज्ञान, अस्वीकार हो दुराचार
बच्चे समझाएं पिता को गर, लेता वो दिखे कोई रिश्वत
पत्नी समझाएं पति को गर, करता वो दिखे कोई दुष्कर्म
विजिलेंस को सूचित करें अगर, सरकारी नौकर दिखे भ्रष्ट
जनप्रतिनिधि की करतूतें भी, स्वीकार न हों गर दिखें गलत

भारत देश के दुर्दिन का, हम सब ही हैं एक बड़ा कारण
रखें न ध्यान सफाई का, फिर कैसे बने एक स्वच्छ भारत
कोसें हर दिन कि नहीं अच्छा है देश मेरा, विदेश सही
फिर बरतें क्यों न वो शिष्टाचार, जो करते विदेशों में जाकर
रखें सब मिल कर स्वच्छ सुघर, घर, परिवार, समाज का दर
आओ मिलकर सब हंसी खुशी, निर्माण करें एक नव भारत

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