काव्य श्रृंखला – 2

हरिद्वार की यात्रा

यादगार रही मेरी जर्नी
हमसफ़र रहे बहु बहु वर्णी
कोई हरिद्वार को जाता था
कोई हरिद्वार से जाता था
संतोष न था पर एक में भी
शायद न हरि से कोई नाता था

जिसकी जितनी ज्यादा थी उमर
दिखती न थी लोभ की कोई कसर
सब लड़ते थे, सब भिड़ते थे
थे भारत में पर सद्भाव न था

है धन्य भूमि हरिद्वार की
सब पुण्य कमाने आते हैं
तन तो धोते पर मन का क्या
और मन बिन तन धोना ही क्या
जब धो न सके वो विकारों को
काया धोने क्यों आते थे
इतनी दुर्गति भी नहीं अभी
कि स्नान को जल न पाते थे

सुन हे मानव, गुन हे मानव
सब तीर्थ धाम तेरा मन है
गर धो न सका तू अंतर्मन
फिर तीर्थ भ्रमण तेरा निष्फल है

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