काव्य श्रृंखला – 45

क्या हुआ अगर चले थे ढूंढने इंसानियत गुमनाम राहों मेंदिशाएं स्याह, काले मन, बड़ी संगीन दुनिया थीभले मानुष दिखे अब रेड डाटा बुक के पन्नों परसड़ी बुद्धि, भ्रमित जनता, बड़ी…

काव्य श्रृंखला – 44

दान या दिखावा लड़कर वो खुद शमशीरों सेपत्थर को मकान बनाता हैआजीवन इज्जत को तरसेचुपचाप कहीं मर जाता है देखें हैं लुटेरे अरबों केबंगलों की नींव हैं लाशों परआंखों की…

काव्य श्रृंखला – 42

कैसे मनाए श्रम दिवस चुपचाप बैठा धाम मेंआंसू भरी आंखें लिएचिंता सताए शाम कीरोटी मिले या ना मिले बच्चों का क्रंदन असह्य हैभार्या का सूना भाल हैजीवन की प्रत्याशा घटीसुरसा…